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अरमानों का लुटना और रोटी सेंकना

।।मो जुनैद।।(प्रभात खबर पटना)1978 में आयी फिल्म गमन का गाना सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है. इस शहर का हर शख्स परेशान सा क्यों है.. सुन रहा था कि चिलमन भाई की आमद हुई. बोले, तेरी आंखें नम हैं, तो मुङो क्या, तुझे गम है, तो मुझे क्या? मैं तो लुंगी डांस […]

।।मो जुनैद।।
(प्रभात खबर पटना)
1978 में आयी फिल्म गमन का गाना सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है. इस शहर का हर शख्स परेशान सा क्यों है.. सुन रहा था कि चिलमन भाई की आमद हुई. बोले, तेरी आंखें नम हैं, तो मुङो क्या, तुझे गम है, तो मुझे क्या? मैं तो लुंगी डांस करूंगा. मैं बोला, बेशर्म! वक्त और हालात तो देखा कर. जिंदगी बेवक्त दगा दे गयी और हुंकार रैली में कितनों के अरमान लुट गये. अभी भी दहशत में हैं लोग

चिलमन बोले, गजब! हर तरफ हर कोई अपनी रोटी सेंकने में है और तुम शहरयार साहब का कलाम सुन कर परेशान हो रहे हो. कहीं दीप जले कहीं दिल. तुम दिल पर मत ले यार. दिल जलता है तो जलने दे, आंसू न बहा फरियाद न कर. बस लुंगी डांस कर और अपनी रोटी सेंक. मैं बोला, यार हम सब की भी कुछ जिम्मेवारी बनती है न! चिलमन बोले, यार गृहमंत्री से भी ज्यादा जिम्मेवारी है क्या? पटनामें बम ब्लास्ट के समय वे रज्जो के रंग में अपनी रोटी सेंक रहे थे या नहीं. हुंकार रैली में चीख-पुकार के बावजूद कुछ लोग रोटी सेंके या नहीं. गांधी मैदान में ब्लास्ट के बाद धुआं दिखा, तो एक नेता बोला, उधर ध्यान मत दें, टायर फटा है. जब सब कुछ फट गया तो कोई रैली सफल, तो कोई विफल पर अपनी रोटी सेंकने से बाज आये क्या? मरनेवालों पर मातम कम और लाश पर रोटी ज्यादा सेंकी जा रही है.

घायलों के जख्म पर मरहम लगाने की जगह नफा-नुकसान का हिसाब किया जा रहा है. भाई ! मरता भी आदमी है. मारता भी आदमी है, सब रोटी सेंकने का नतीजा है. आखिरकार बेले जाते हैं बेगुनाह आम अवाम. मैं कहता हूं कि क्या जरूरी है कि अपनी बात बड़ी रैली के माध्यम से पहुंचायी जाये. इस शक्ति प्रदर्शन के खेल में किसका कितना नुकसान होता है, यह कोई पार्टी नहीं बता सकती है. न ही कोई नेता कभी नुकसान की भरपाई कर सकता है. यह तो आमजन ही बता सकता है, जो एंबुलेंस की जगह कंधे पर प्रसूता को लेकर अस्पताल पहुंचता है. गाड़ी छोड़ कर पैदल ऑफिस जाता है और लौटता है. किसी की परीक्षा छूट जाती है. व्यवसायी दिन भर अनहोनी की आशंका से अपनी दुकानें बंद रखता है.

हुंकार रैली में बम ब्लास्ट के शिकार हुए पीड़ित परिवार का कोई भी सदस्य अब कभी किसी रैली में जाकर प्रिय नेता को सुनना पसंद करेगा? क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि महंगी व खतरनाक रैली की जगह अपना संदेश नेतागण विभिन्न माध्यमों से आमजन तक पहुंचायें. बम ब्लास्ट के बाद हालात ऐसे हो गये हैं कि बाथरूम में भी जरा सी आहट होती है, तो दिल सोचता है कि कहीं ये वो तो नहीं. एक तरफ एसपीजी, जेड श्रेणी सुरक्षा व बुलेट प्रूफ गाड़ी, दूसरी तरफ क्या? इस हादसे ने दिल, दिमाग का हुलिया सहित सोचने का नजरिया ही बदल दिया. अब आमजन कहते हैं कि बड़े नेताओं का आना, रैली, जुलूस में शामिल होना यानी अरमानों का लुट जाना.

Prabhat Khabar Digital Desk
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