धमाकों से उठते सवाल, मिलती सीख

आतंकवाद से लड़ने के तमाम दावों के बावजूद भारत में आतंकवाद लगातार अपने पांव पसार रहा है. अब बिहार की राजधानी पटना का नाम भी आतंकवादी हमलों के मानचित्र में दर्ज हो गया है. रविवार को पटना में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की पूर्व निर्धारितहुंकार रैलीसे पहले रैली स्थल […]
आतंकवाद से लड़ने के तमाम दावों के बावजूद भारत में आतंकवाद लगातार अपने पांव पसार रहा है. अब बिहार की राजधानी पटना का नाम भी आतंकवादी हमलों के मानचित्र में दर्ज हो गया है. रविवार को पटना में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की पूर्व निर्धारितहुंकार रैलीसे पहले रैली स्थल गांधी मैदान में और उसके आसपास श्रृंखलाबद्ध बम धमाके हुए, जिनमें सात लोग मारे गये और 80 से ज्यादा लोग घायल हो गये. एक बड़े राजनीतिक आयोजन में इस तरह का आतंकवादी हमला सुरक्षा और खुफिया तंत्र की बड़ी नाकामी का सबूत है. .
हुंकार रैली. का ऐलान चार महीने पहले किया जा चुका था. इसमें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी पूर्वघोषित थी. लाखों लोगों के जमा होने के दावे किये जा रहे थे. आयोजन की विशालता को देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम की उम्मीद हर किसी को थी. लेकिन, सारे सुरक्षा इंतजामों को धता बताते हुए, जिस तरह से आतंकवादी विस्फोटक सामग्रियों के साथ न सिर्फ रैली स्थल तक पहुंचने, बल्कि बम धमाकों को अंजाम देने में भी सफल हो गये, वह कई सवाल पैदा करता है. पहला सवाल यह है कि इसकी जवाबदेही किस पर है? क्या इसके लिए सिर्फ इंटेलीजेंस की नाकामी को कसूरवार माना जा सकता है? अगर वाकई खुफिया एजेंसियां साजिश की पूर्व सूचना देने में असफल रहीं, तो भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि हमलावरों को रैली स्थल में प्रवेश करने से रोका क्यों नहीं जा सका!
आखिर रैली में आनेवालों की जांच की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं की गयी थी? वैसे, इन सवालों के बीच पटना की रैली का एक सकारात्मक पक्ष भी उभर कर आया है. बम विस्फोट के बाद की उत्तेजना पर काबू पाते हुए भाजपा नेताओं ने अपने भाषणों में जिस संयम का परिचय दिया, वह आज की राजनीति में विरल होता जा रहा है. भीड़ की एक खास मानसिकता (मॉब मेंटिलिटी) होती है. अगर रैली के मंच से उस मानसिकता को थोड़ी सी भी गलत दिशा दी जाती, तो परिणाम भयंकर हो सकते थे. रैली में मौजूद भाजपा नेताओं की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने चिंगारी को हवा देने की जगह उसे बुझाने की कोशिश की. ऐसी सार्वजनिक कोशिशों से ही देश और समाज एकीकृत हो सकता है.
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