जलता झरिया, बुझते लोग

राष्ट्र के औद्योगिक विकास में मेरुदंड की भूमिका निभानेवाला झरिया कोयलांचल आज अपनी खोयी पहचान पाने की जद्दोजहद कर रहा है. दरअसल 1916 से लगी आग ने इस क्षेत्र और राज्य की कमर ही तोड़ दी. कोयले ने झरिया को विश्व के मानचित्र पर अहम स्थान दिलाया, लेकिन आज यह क्षेत्र अपने ही अधिकारियों और […]
राष्ट्र के औद्योगिक विकास में मेरुदंड की भूमिका निभानेवाला झरिया कोयलांचल आज अपनी खोयी पहचान पाने की जद्दोजहद कर रहा है. दरअसल 1916 से लगी आग ने इस क्षेत्र और राज्य की कमर ही तोड़ दी.
कोयले ने झरिया को विश्व के मानचित्र पर अहम स्थान दिलाया, लेकिन आज यह क्षेत्र अपने ही अधिकारियों और नेताओं की मूकदर्शिता का शिकार है. प्राइवेट कंपनियों द्वारा उन्नत तकनीक के अभाव में खनन जारी रखने और ज्वलनशील गैसों की मौजूदगी ने आग में घी डालने का काम किया और परिणामस्वरूप यह क्षेत्र आग में झुलसता गया.
देश आजाद हुआ, सरकार बदली, कानून बदला, कंपनियां बदलीं, नहीं बदली तो इस क्षेत्र की दशा. दुर्भाग्य है कि एक ओर हम प्राकृतिक संसाधनों का रोना रोते हैं, तो दूसरी तरफ बहुमूल्य संसाधनों को आग की लपटों में स्वाहा होते देखते हैं.
सुधीर कुमार, हंसडीहा, दुमका
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