स्थानीय नीति की आवश्यकता

झारखंड राज्य की मौजूदा समस्याओं में झारखंडी स्थानीय नीति एक ज्वलंत मुद्दा बन चुकी है. राज्य के नवयुवकों के रोजगार के संदर्भ में शीघ्र स्थानीय नीति का बनना अतिआवश्यक है. परंतु राज्य की राजनीतिक अस्थिरता के आलोक में ऐसे किसी फैसले की कल्पना करना मूर्खता है. झारखंड के साथ ही गठित उत्तराखंड तथा छत्तीसगढ़ जैसे […]
झारखंड राज्य की मौजूदा समस्याओं में झारखंडी स्थानीय नीति एक ज्वलंत मुद्दा बन चुकी है. राज्य के नवयुवकों के रोजगार के संदर्भ में शीघ्र स्थानीय नीति का बनना अतिआवश्यक है. परंतु राज्य की राजनीतिक अस्थिरता के आलोक में ऐसे किसी फैसले की कल्पना करना मूर्खता है.
झारखंड के साथ ही गठित उत्तराखंड तथा छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की स्थानीय नीति का अवलोकन सरकार द्वारा करना चाहिए. लेकिन सरकार अभी तक स्थानीयता की परिभाषा तय करने में ही असफल रही है.
ऐसे में सरकारी नियुक्तियों में 27% आदिवासी एवं झारखंडी बेरोजगारों को स्थानीयता का समुचित लाभ न मिल पाना अफसोसनाक है. राज्य के नेता और मंत्री अनर्गल आश्वासन और बयानबाजी कर राजनीतिक रोटी सेंकने में लगे हैं. क्या झारखंड विभाजन से हमें इसी विकास की अपेक्षा थी!
महेंद्र नाथ महतो, नावागढ़
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