आंकड़ों की साख

Updated at : 29 Oct 2015 12:45 AM (IST)
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आंकड़ों की साख

इस साल अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता एंगस डीटॉन यदि भारत में विकास और गरीबी के आंकड़ों पर संदेह जता रहे हैं, तो इसे खारिज करने की बजाय इस पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत है. एक अंगरेजी अखबार को दिये इंटरव्यू में डीटॉन ने कहा है कि भारत की विकास दर में तेजी […]

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इस साल अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता एंगस डीटॉन यदि भारत में विकास और गरीबी के आंकड़ों पर संदेह जता रहे हैं, तो इसे खारिज करने की बजाय इस पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत है. एक अंगरेजी अखबार को दिये इंटरव्यू में डीटॉन ने कहा है कि भारत की विकास दर में तेजी और चीन से आगे निकलने के दावे असल में आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किये जाने का नतीजा हो सकते हैं.
डीटॉन मानते हैं कि पिछले कुछ दशकों में देश में आम लोगों का जीवनस्तर बेहतर हुआ है, लेकिन यहां गरीबों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा है. इसे मौजूदा केंद्र सरकार के कामकाज पर टिप्पणी न मानते हुए, स्वीकार करना चाहिए कि किसी देश के विकास और गरीबी से जुड़े आंकड़ों की विश्वसनीयता से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी अर्थव्यवस्था की साख बनती है.
लोकतांत्रिक देश में सरकारें बदलती रहती हैं, अर्थव्यवस्था की रफ्तार में उतार-चढ़ाव भी आता रहता है, लेकिन वैश्विक निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती हैं वहां कारोबार की परिस्थितियां और सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता.
इसलिए डीटॉन की टिप्पणी को हमारे नीति-निर्धारक भले ही अनसुनी कर दें, दुनिया इस पर जरूर ध्यान देगी. इस कड़ी में डीटॉन के विदेशी होने और उनके खान-पान को लेकर सोशल मीडिया पर की गयी कुछ टिप्पणियां हास्यास्पद हैं. स्कॉटलैंड में पैदा हुए और कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी करनेवाले डीटॉन ने गरीबी, कुपोषण और आर्थिक असमानता से संबंधित शोध के लिए भारत में काफी समय बिताया है.
भारतीय अर्थशास्त्रियों के साथ तैयार उनके कई शोधपत्रों से सरकारों को नीति निर्धारण में मदद मिलती रही है. गौर करें तो अपने देश में गरीबी के आकलन के लिए समय-समय पर बनी विशेषज्ञों की समितियों की रिपोर्ट में एकरूपता नहीं है. गरीबों की संख्या का कोई सर्वमान्य आंकड़ा उपलब्ध न होने से कल्याणकारी नीतियों की दिशा और कार्यान्वयन की राह हमेशा कठिन बनी रहेगी. डीटॉन की टिप्पणी का संदेश साफ है.
हाल के दशकों में विकास की रफ्तार तेज करने के प्रयासों के बूते अधिकतर लोगों का जीवन स्तर भले ही बेहतर हुआ है, लेकिन एक बड़ी आबादी अब भी गरीबी के अंधेरे कुएं से बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है. ऐसे लोगों तक विकास की रोशनी पहुंचाने के लिए सरकारों को अभी बहुत कुछ करना बाकी है. इसलिए सरकारों को आंकड़ों की बाजीगरी के बजाय धरातल पर गरीबी कम करने और गरीबी के पैमाने को विश्वसनीय बनाने का प्रयास करना चाहिए.
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