हे बबुनी, कइसे रोपब गरमा के धान

Updated at : 28 Oct 2015 12:44 AM (IST)
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हे बबुनी, कइसे रोपब गरमा के धान

बिहार में बाढ़ प्रभावित महानंदा बेसिन के गरीब किसान परिवारों के लिए गरमा धान उपजाना एक सपना बनता जा रहा है. गरमा धान से तैयार भात के साथ मछली यहां के लोगों का मुख्य भोजन रहा है. अगर मछली न मिले, तो कमजोर, वंचित, दलित परिवार गरमा धान में सरसों तेल व नमक मिला कर […]

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बिहार में बाढ़ प्रभावित महानंदा बेसिन के गरीब किसान परिवारों के लिए गरमा धान उपजाना एक सपना बनता जा रहा है. गरमा धान से तैयार भात के साथ मछली यहां के लोगों का मुख्य भोजन रहा है.

अगर मछली न मिले, तो कमजोर, वंचित, दलित परिवार गरमा धान में सरसों तेल व नमक मिला कर भी बहुत चाव से खाते हैं. लेकिन बदलती व्यवस्था की गलत नीतियों की मार ने लोगों की थाली से गरमा धान की गमगमाती खुशबू को छीना है.

गरमा धान की किसानी काफी महंगी होती जा रही है. पारंपरिक किसानी की बदौलत गरमा धान को नहीं उपजाया जा सकता है. तकनीक के इस युग में जीवन उपभोग की मुख्य चीज यानी गरमा धान की चाह में हम रासायनिक खाद व कीटनाशकों की तरफ रुख कर चुके हैं. गरमा उपजाने के लिए पंपिंग सेट से पानी पाटना पड़ता है, ट्रैक्टर से खेती होती है.

आम गरीब किसान के लिए न चाहते हुए भी यह पहुंच से बाहर होता जा रहा है. गौरतलब है कि महानंदा बेसिन स्थित कटिहार जिला के आजमनगर ब्लॉक स्थित बेलवारी गांव की लगभग पचास फीसदी आबादी इसी धान को उपजाने की चाह में दिल्ली-पंजाब पलायन करने को विवश है. प्रत्येक वर्ष छठ का पर्व खत्म होते ही कमजोर-गरीब तबकों को तीन-चार महीने के लिए गरमा धान के लिए पूंजी जुगाड़ने बाहर जाना पड़ता है.

स्थानीय साहित्यकार जयशंकर सोनेलिया ने अपनी पुस्तक ‘हाय रे महानंदा की बाढ़’ में स्थानीय गरीब किसानों के द्वारा गरमा धान की खेती करने के लिए होनेवाले पलायन को बहुत भावुकतापूर्वक उकेरने की कोशिश की है. किसान अपनी पत्नी से कहता है कि अगर वह परदेस नहीं जायेगा, तो गरमा धान उपजाने के लिए पूंजी कहां से आयेगी.

खेती में उपयोग होनेवाले पंपिंग सेट के लिए तेल-डीजल, खाद-पानी की जुरूरत को छोटा व सीमांत किसान कैसे पूरा करेगा. अगहनी धान हाथ आती नहीं है. गरमा धान की खेती नहीं होगी, तो घर-परिवार कैसे चलेगा. अपनी इस भावुक अभिव्यक्ति को वह गीत के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत करता है- ‘हे बबुनी, कैइसे रोपब गरमा के धान हो… हाथ में पइसा नाहीं, घर खर्ची नहीं, मन बड़ा तंगहाल हो, हे बबुनी कैइसे रोपब गरमा के धान हो’. इसका पात्र शंभू जैसे ना जाने कितने लोग पैसा कमाने के लिए शहर का रुख करते हैं.

विकासवादी राज्य का यह कैसा चरित्र है, जो धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियां पैदा करता जा रहा है, जब लोगों को रोजमर्रा की जरूरतें मयस्सर नहीं हो पा रही हैं. एक तरफ जहां गरमा धान गरीब व कमजोर किसान नहीं उपजा पा रहे, वहीं दूसरी तरफ दाल व प्याज की बढ़ती कीमतों की मार से आम लोगों की जेब की नाप छोटी होती जा रही है.

हिंदुस्तानी राज्य का कलेवर कल्याणकारी राज्य से उदारवादी-भूमंडलीकृत राज्य की तरफ हो गया है. क्या इससे राज्य का तंत्र आम कमजोर, वंचित, असहाय व दमित लोगों के प्रति इतना असंवेदनशील हो गया है कि लोगों की गरमा धान की चाह भी पूरी नहीं हो पा रही है? यह कैसा डेवलपमेंट मॉडल है साहब!

पंकज कुमार झा

असिस्टेंट प्रोफेसर, डीयू

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