बासी मिर्ची से मिली जिंदगी में मिठास

Published at :23 Oct 2013 2:55 AM (IST)
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बासी मिर्ची से मिली जिंदगी में मिठास

।।संतोष कुमार झा।। (प्रभात खबर, पटना) रामशरण सुबह नहा-धोकर तैयार हो गया. अपनी खटारा साइकिल में झोला लटकाया और चल पड़ा शहर के फैंसी बाजार की ओर. बात असम की खूबसूरत राजधानी गुवाहाटी की है. गुवाहाटी का फैंसी बाजार पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों का प्रमुख बाजार है. यहां के मारवाड़ियों और पंजाबियों का करोड़ों […]

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।।संतोष कुमार झा।।

(प्रभात खबर, पटना)

रामशरण सुबह नहा-धोकर तैयार हो गया. अपनी खटारा साइकिल में झोला लटकाया और चल पड़ा शहर के फैंसी बाजार की ओर. बात असम की खूबसूरत राजधानी गुवाहाटी की है. गुवाहाटी का फैंसी बाजार पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों का प्रमुख बाजार है. यहां के मारवाड़ियों और पंजाबियों का करोड़ों का व्यवसाय है. देश के बहुतायत अन्य हिस्सों की तरह यहां भी दुकानों में नींबू-मिर्ची लटकाने का खूब प्रचलन है.

रामशरण का मुख्य पेशा दुकानों में ऐसे ही बासी हो चुके नींबू-मिर्ची को इकट्ठा करने का है. रामशरण पिछले सात वर्ष पहले बिहार के वैशाली जिले से असम आया था. उसके पिता हाथ ठेला खींच कर पूरे परिवार का भरण-पोषण करते थे. छह लोगों का बड़ा परिवार था. बड़ी मुश्किल से गुजार-बसर हो पाती थी. इंटर मीडिएट की परीक्षा देने के बाद रामशरण भी रोजगार की तलाश में अपने ग्रामीण मित्र के साथ गुवाहाटी चला आया. यहां दुकानों में काम करने में उसका मन नहीं लगा. रोज ही रामशरण को मालिक की गालियां खानी पड़ती थीं. ग्राहक अगर नाराज हो गया, तो मालिक से एक-दो चांटे भी खाने पड़ जाते थे. इसके बाद उसने अपना व्यवसाय शुरू करने का मन बना लिया.

अगले दिन से उसने दुकानों से बासी नींबू-मिर्ची को इकट्ठा करना शुरू कर दिया. दोपहर में उसे मिक्सर-ग्राइंडर में पीस कर उसमें अन्य सामग्री मिला कर अचार बनाता था. इसमें उसके घर के पड़ोस में रहनेवाली एक महिला मदद किया करती थी. शाम के समय में वह इसे छोटी-छोटी दुकानों में बेचने के लिए दे आता था. बाजार में उपलब्ध अन्य कंपनियों के अचार की अपेक्षा उसका उत्पाद काफी सस्ता और बेहतर था. इस वजह से थोड़े ही दिनों में उसका व्यापार चल निकला. पैसे इकट्ठा कर उसने एक खटाल खोल लिया. अपने गांव के ही दो लड़कों को बुला कर उन पर खटाल की देखभाल की जिम्मेवारी सौंप दी. दो साल के बाद रामशरण ने बैंक से कर्ज लेकर एक पिकअप वैन ले लिया.

उसका यह व्यवसाय भी चल निकला. फिलहाल रामशरण अपने व्यवसाय के माध्यम से छह लोगों की आजीविका चला रहा है. इतना ही नहीं, उसने अपने गांव में पक्का मकान भी बनवा लिया है. छोटे भाई-बहनों को वह अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहा है. अपने माता-पिता को कामाख्या धाम, शिलांग, चेरापूंजी आदि की सैर करवा चुका है. रामशरण कहता है कि सिर्फ सपने देखने से कुछ नहीं होता है. सपने को हकीकत में बदलने के लिए कर्म भी करना पड़ता है. हां, इसके लिए हौसला जरूरी है. गुवाहाटी में भी शुरुआती दिनों में स्थानीय लफंगों ने उसे काफी परेशान किया. पर, अपनी सूझ-बूझ से वह सारी परेशानियों से डट कर मुकाबला करता रहा. रामशरण कहता है कि यूपी-बिहार के लोगों में मेहनत करने का बहुत जज्बा है, लेकिन एक ही मुश्किल है, उन्हें सही राह नहीं मिल पाती. राह मिलते ही वे चल निकलते हैं.

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