राजभाषा के बाज उड़ानेवाला किसान

Published at :26 Sep 2015 2:35 AM (IST)
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राजभाषा के बाज उड़ानेवाला किसान

डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र वरिष्ठ व्यंगकार यह कहानी पंचतंत्र में नहीं है, पर इसका संदेश महत्वपूर्ण है. एक राजा को किसी शिकारी ने उपहार में अच्छी नस्ल के बाज के दो बच्चे भेंट किये. राजा ने उन्हें ठीक से पालने-पोसने और उड़ना सिखाने के लिए एक अनुभवी पक्षी विशेषज्ञ नियुक्त किया. कुछ महीने बाद राजा को […]

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डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
वरिष्ठ व्यंगकार
यह कहानी पंचतंत्र में नहीं है, पर इसका संदेश महत्वपूर्ण है. एक राजा को किसी शिकारी ने उपहार में अच्छी नस्ल के बाज के दो बच्चे भेंट किये. राजा ने उन्हें ठीक से पालने-पोसने और उड़ना सिखाने के लिए एक अनुभवी पक्षी विशेषज्ञ नियुक्त किया. कुछ महीने बाद राजा को दोनों बाज देखने की इच्छा हुई. वह उस आरामबाग में पहुंचा, जहां दोनों बाज पाले जा रहे थे.
राजा ने देखा कि दोनों बड़े हो गये हैं और शानदार लग रहे हैं. उसने पक्षी विशेषज्ञ से कहा कि ‘आप इन्हें उड़ने का इशारा कीजिए. मैं देखना चाहता हूं कि इन्होंने उड़ान में कितनी कलाबाजी सीखी है.’ विशेषज्ञ का इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे. मगर जहां एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था, वहीं दूसरा थोड़ी ऊंचाई तक जाकर पुनः उसी डाल पर लौट जाता था, जहां से उड़ा था. यह देख राजा को अजीब लगा.
राजा ने विशेषज्ञ से पूछा- ‘क्या बात है, जहां एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है, वहीं दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा?’ उसने जवाब दिया- ‘जी हुजूर, इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है. वह इस डाल को छोड़ता ही नहीं.’
राजा दोनों बाजों को उड़ते देखना चाहता था. उसने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊंची उड़ान भराने में कामयाब हो जायेगा, उसे इनाम दिया जायेगा.
अगले दिन से ही लोग जोर-आजमाइश में लग गये. देश-विदेश से एक से एक पक्षी-विशेषज्ञ इनाम के लोभ में आये, एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया, मगर बाज अपनी आदत से लाचार था. वह थोड़ी दूर तक उड़ान भरता और लौट कर अपनी डाल पकड़ लेता. सब निराश होकर चले गये. राजा भी निराश. इनाम की राशि दुगुनी-तिगुनी कर दी गयी, मगर उसका असर बाज पर नहीं पड़ा.
कुछ दिन बाद राजा आरामबाग से गुजर रहा था, तो यह देख कर उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही कि दोनों बाज एक साथ आसमान में ऊंची उड़ानें भर रहे हैं, हवा में गोते लगा रहे हैं, तरह-तरह के करतब कर रहे हैं. राजा ने घोषणा की कि जिसने भी यह करामात की है, कल दरबार में पेश हो. उसे निर्धारित पुरस्कार दिया जायेगा. अगले दिन राज दरबार में एक अधेड़ उम्र का एक किसान पेश हुआ, जो उसी राज्य के एक छोटे-से गांव का था.
राजा ने उसकी प्रशंसा की और ढेर सारे इनाम देकर पूछा कि जिस काम को देश-विदेश के पक्षी-विशेषज्ञ नहीं कर पाये, उसे आपने कैसे कर दिया? किसान ने कहा कि मैंने कुछ नहीं किया राजन! बस जिस डाल पर बाज बैठा रहता था, उसे ही काट दिया. वह बाज जिस डाल पर बैठने का आदी हो चुका था, वह डाल ही नहीं रही, तो मजबूर होकर वह भी अपने साथी के साथ उड़ने लगा.
दरअसल, हम सभी उस बाज की तरह ही जिंदगी में ऊंची उड़ान भरने में समर्थ हैं, पर जब अपने किसी काम में इतने लिप्त हो जाते हैं कि ऊंची उड़ान भरने की काबिलियत खो देते हैं. राजभाषा हिंदी के प्रयोग के संदर्भ में हमारी अफसरशाही के साथ भी यही हादसा हुआ है.
वह हिंदी में काम तो कर सकती है, मगर अंगरेजी की डाल से ऐसी चिपकी हुई है कि उसमें हिंदी के आकाश में ऊंची उड़ान भरने का हौसला ही नहीं रह गया है और वह लगभग आधी सदी से अपनी काबिलियत को अनदेखा कर रही है, वरना हिंदी न जाने कब केंद्रीय कार्यालयों में भी उसी तरह फलती-फूलती दिखती, जैसे हिंदीभाषी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में दिखती है. जरूरत है उस किसान की, जो कड़ाई से उस डाल को काट दे, जिससे आज भी अफसरशाही चिपकी हुई है.
राज्यों में ऐसा हुआ भी है. बिहार के ग्रामीण परिवेश से आये और ग्रामीण भाषा-संस्कृति पर नाज करनेवाले राजनेता कर्पूरी ठाकुर ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में निर्देश दे दिया कि आज से मेरे पास केवल हिंदी में फाइलें भेजी जाएं. एक आइएएस सचिव ने उस निर्देश की अनदेखी कर अंगरेजी में फाइल भेज दी. कर्पूरी जी ने उसे बुला कर बहुत समझाया कि सभी जब हिंदी में काम करते हैं, तो आप भी कोशिश कीजिए. कुछ दिनों में ही आपकी झिझक दूर हो जायेगी.
मगर उस अधिकारी पर आइएएस होने का नशा सवार था, जो काम करे न करे, उसकी नौकरी जा नहीं सकती. उसने साफ मना कर दिया. तब कर्पूरी जी ने कड़े लहजे में कहा कि आप जिस राज्य सरकार के कार्यालय में नियुक्त हैं, उसकी कामकाज की भाषा हिंदी है. अगर आप अपने को अक्षम पाते हैं, तो मैं आज ही आपको वापस केंद्र को सुपुर्द कर देता हूं, क्योंकि आप जैसे मोटी तनख्वाह पानेवाले अधिकारी को बिठा कर खिलाना बिहार जैसे गरीब राज्य के लिए संभव नहीं है. अगले दिन से ही वह अधिकारी हिंदी में फाइलें भेजने लगा.
भारतीय संविधान के लागू होने के 15 वर्षों बाद हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में पूरी तरह प्रतिष्ठित हो जाना था और ‘सहायक भाषा के रूप में अंगरेजी चलती रहेगी’ वाक्य की डाल कट जानी थी. पर अफसरशाही के बाज उस डाल से चिपके रहने के आदी थे, इसलिए वह नहीं कटी, बल्कि अंगरेजी-परस्त प्रधानमंत्री नेहरू ने उलटे उसे और इतना मजबूत कर दिया कि उसे काटना असंभव हो गया है. राजभाषा अधिनियम उस डाल को बनाये रखने के लिए ही है.
जहां नहीं जरूरत है, वहां भी हिंदी के साथ-साथ अंगरेजी का प्रयोग करने के लिए यह अधिनियम बाध्य करता है, जिससे अधिकारी परेशान हैं. मसलन, जो परिपत्र केवल हिंदीभाषी क्षेत्र के किसी कार्यालय में केवल अपने कार्मिकों के लिए जारी होता है, उसे भी हिंदी-अंगरेजी में जारी करने की बाध्यता से घबरा कर अकसर अधिकारी केवल अंगरेजी में परिपत्र जारी कर, नीचे लिख देते हैं कि हिंदी पाठ शीघ्र निर्गत किया जायेगा; जो कभी नहीं होता.
भारत सरकार के कार्यालयों में जब तक राजभाषा अधिनियम में हिंदी-अंगरेजी दोनों में साथ-साथ प्रशासनिक कार्य करने की बाध्यता रहेगी, तब तक अफसर लोग आदतन अपनी डाल से चिपके रहेंगे.
कम-से-कम दस हिंदीभाषी राज्यों में, जहां की सरकारें पूरी तरह हिंदी में काम करती हैं, वहां केंद्रीय कार्यालयों, बैंकों, उपक्रमों में हिंदी में काम करने के लिए अंगरेजी को लादने की बाध्यता हटा देनी चाहिए. मुझे विश्वास है कि ये कार्यालय अंगरेजी की डाल कट जाने के बाद उस बाज की तरह ही हिंदी के आकाश में ऊंची उड़ान भरने लगेंगे.
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