डाक टिकट पर शोर

Published at :19 Sep 2015 9:12 AM (IST)
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डाक टिकट पर शोर

पूर्व प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की स्मृति में चलाये गये डाक टिकटों को जारी नहीं रखने के केंद्र सरकार के निर्णय पर राजनीतिक बयानबाजी जोरों पर है. सरकार का पक्ष रखते हुए केंद्रीय संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि उनकी योजना महत्वपूर्ण राष्ट्र-निर्माताओं के योगदान को रेखांकित करते हुए नये डाक […]

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पूर्व प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की स्मृति में चलाये गये डाक टिकटों को जारी नहीं रखने के केंद्र सरकार के निर्णय पर राजनीतिक बयानबाजी जोरों पर है. सरकार का पक्ष रखते हुए केंद्रीय संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि उनकी योजना महत्वपूर्ण राष्ट्र-निर्माताओं के योगदान को रेखांकित करते हुए नये डाक टिकटों की शृंखला लाने की है तथा इन पर सिर्फ गांधी परिवार के वर्चस्व को कायम रखना ठीक नहीं है.

कांग्रेस ने भाजपानीत सरकार के इस कदम को बदले की भावना से लिये गये फैसले की संज्ञा दी है और कहा है कि यह इतिहास का अपमान तथा दोनों नेताओं के योगदान को कम करने की कोशिश है. डाक टिकटों पर महापुरुषों और बड़े नेताओं की तस्वीरें छापना, उनके नाम पर योजनाओं, संस्थाओं, सड़कों, भवनों आदि का नामकरण करना और महत्वपूर्ण अवसरों पर उन्हें याद करना उनके योगदान और संदेशों से सतत प्रेरणा लेने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है. इन्हीं वजहों से अन्य देशों के महान लोगों के नाम पर भी स्मृति-चिह्न या स्मारक बनाये जाते हैं. ऐसा हमारे देश में भी हुआ है.

लेकिन यह एक त्रासद विडंबना है कि कई दशकों तक सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस ने इस पावन कर्तव्य को काफी हद तक एक परिवार-विशेष के कुछ नेताओं की याद तक सीमित कर दिया. देश के सुदीर्घ इतिहास, स्वतंत्रता के लिए चले गौरवपूर्ण संघर्ष और आजादी के बाद देश की सेवा, एकता और अखंडता तथा भारत को आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में अनेक महापुरुषों और नेताओं का योगदान और बलिदान रहा है. ये लोग अलग-अलग विचारधाराओं, पृष्ठभूमियों और जीवन-क्षेत्रों से संबद्ध थे. लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने, चाहे वे केंद्र में रही हैं या राज्यों में, गांधी-नेहरू परिवार के अलावा अन्य महापुरुषों को समुचित सम्मान देने में शर्मनाक कोताही बरती है. यह पाठ्य-पुस्तकों के लेखों से लेकर सड़कों के नामकरण तक में देखा जा सकता है. अगर कांग्रेस ने गांधी परिवार से इतर कुछ नेताओं को याद भी किया तो, तो वह रस्म-अदायगी या औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं था. डाक टिकटों के मामले में भी इस बात को साफ तौर पर देखा जा सकता है. सामान्यत: डाक विभाग दो तरह के डाक टिकट जारी करता है. कुछ महत्वपूर्ण अवसरों, व्यक्तियों, घटनाओं आदि की स्मृति या आदर में बतौर स्मारिका डाक टिकटें जारी की जाती हैं. दूसरी श्रेणी उन टिकटों की है, जिन्हें हम उपयोग में लाते हैं. आम उपयोग के लिए जो टिकटें उपलब्ध हैं, उनमें गांधी परिवार से जुड़े नेताओं के अलावा अन्य महापुरुषों के चित्र वाले टिकटों की उपलब्धता न के बराबर है. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी पर डाक टिकटें ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ शृंखला का हिस्सा थीं.

अब तय किया गया है कि ‘भारत के निर्माता’ शृंखला के तहत टिकट जारी होंगे, जिनमें देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, महान सेनानी सुभाष चंद्र बोस, राष्ट्रीय एकता के प्रेरणा-पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अंत्योदय के विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय, सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक व्यक्तित्व बिस्मिला खान, एमएस सुब्बालक्ष्मी, पंडित जसराज जैसी विभूतियों को शुमार किया जा रहा है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ये निर्णय सरकार के नहीं है. वह टिकट-संग्रह पर सलाहकार समिति की अनुशंसाओं को लागू करने का काम कर रही है. इस प्रकरण में कांग्रेस को चाहिए कि केंद्रीय संचार मंत्री के बयान पर खुले मन से गौर करे. रविशंकर प्रसाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘सभी महापुरुषों को सम्मानित किया जाना चाहिए. यह किसी परिवार मात्र का विशेषाधिकार नहीं है.’ विभिन्न राजनीतिक वैचारिकी और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े लोगों को आदर देकर सरकार ने सराहनीय प्रयास किया है और इस संबंध में उसके उदात्त रुख की प्रशंसा की जानी चाहिए. कांग्रेस की आलोचना के तथ्य और तर्क सही हो सकते हैं और उन पर अलग से चर्चा भी की जा सकती है, पर मसले को ठीक से समझने के लिए कांग्रेस को अपने अतीत के बारे में गंभीर आत्मचिंतन करने की जरूरत है. राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र से हाशिये पर उत्तरोत्तर जाती कांग्रेस को यह स्वीकार करना होगा कि गांधी परिवार के गिने-चुने नेताओं के अलावा इस देश को यहां तक लाने में अनेक महत्वपूर्ण लोगों ने युगांतकारी भूमिकाएं निभायी है. उन्हें सम्मानित करने और उनसे प्रेरणा लेने की हर कोशिश का स्वागत किया जाना चाहिए.

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