नदियों का संगम

Published at :17 Sep 2015 5:44 AM (IST)
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नदियों का संगम

आंध्रप्रदेश के इब्राहिमपटनम गांव में गोदावरी नदी से कृष्णा नदी में करीब 80 टीएमसी पानी छोड़े जाने के साथ, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना ने एक अहम पड़ाव पार किया है. गोदावरी से कृष्णा को जोड़ने की पोलावरम परियोजना पर आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के समय […]

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आंध्रप्रदेश के इब्राहिमपटनम गांव में गोदावरी नदी से कृष्णा नदी में करीब 80 टीएमसी पानी छोड़े जाने के साथ, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर की महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना ने एक अहम पड़ाव पार किया है. गोदावरी से कृष्णा को जोड़ने की पोलावरम परियोजना पर आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के समय में काम शुरू हुआ था.
अनेक बाधाओं के बावजूद अब यह परियोजना जमीन पर साकार हुई है, तो इसका श्रेय केंद्र को भी दिया जाना चाहिए. 2014 में बनी एनडीए सरकार ने वाजपेयी के वक्त की परियोजना के प्रति प्रतिबद्धता दिखायी. इससे पहले 2004 में बनी यूपीए सरकार ने पर्यावरण संबंधी आपत्तियों के मद्देनजर परियोजना को ठंढे बस्ते में डाल दिया था. केंद्र में नयी सरकार के गठन के कुछ माह बाद जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने स्पष्ट किया था कि नदियों को जोड़ने की सभी 30 परियोजनाओं को राज्यों की अनुमति मिलने पर सात से दस साल के भीतर पूरा कर दिया जायेगा. इनमें 16 परियोजनाएं देश के प्रायद्वीपीय हिस्से में हैं, 14 हिमालयी क्षेत्र में क्रियान्वित होंगी. परियोजना के मुख्य उद्देश्य देश की खेती-किसानी की मॉनसून पर निर्भरता कम करना, पर्यटन को विस्तार देना और पनबिजली के उत्पादन में इजाफा करना हैं.
हालांकि, उद्देश्यों के लिहाज से अत्यंत उपयोगी जान पड़नेवाली यह परियोजना नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में मानव निर्मित इंजीनियरिंग के भारी हस्तक्षेप से ही संभव है. मूल योजना ब्रह्मपुत्र और गंगा के निचले बेसिन से करीब 170 अरब क्यूबिक मीटर नदी-जल को पानी की कमी से जूझ रहे पश्चिमी तथा मध्य भारत तक पहुंचाने की है. यह काम अनेक बड़े बांध, जलागार तथा 14 हजार किमी लंबी नहर बना कर किया जाना है.
सूखे और बाढ़ दोनों के समाधान की बात कह कर सरकार इसे जायज और जरूरी ठहरा रही है, पर याद रखना चाहिए कि परियोजना का बड़ा हिस्सा हिमालयी क्षेत्र में है, जहां की संवेदनशील पारिस्थितिकी से पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के बिना छेड़छाड़ भयावह आपदा को आमंत्रण देने सरीखा हो सकता है. बड़े बांध एक बड़े हिस्से को डूब का शिकार बनाते हैं, जिससे बड़ी आबादी विस्थापन का शिकार होती है. नर्मदा बचाओ आंदोलन का अनुभव यही कहता है. कोसी जैसी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप के नतीजे बिहार जैसे राज्य पहले से भुगत रहे हैं.
कोसी की तलहटी में जमी गाद हर साल भीषण बाढ़ के रूप में भारी तबाही लाती है. इसलिए, यह परियोजना लागत-लाभ की गणना के साथ-साथ दूरगामी सामाजिक, आर्थिक तथा पर्यावरणीय प्रभावों के ठीक-ठीक आकलन के बाद ही अमल में लायी जानी चाहिए.
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