मूषक जी से है रिश्ता पुराना कोई

Published at :03 Sep 2015 12:12 AM (IST)
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मूषक जी से है रिश्ता पुराना कोई

वीर विनोद छाबड़ा सेवानिवृत्त अधिकारी (फेसबुक वॉल से साभार) सुबह मुंह-अंधेरे उठ कर सबसे पहला काम होता है, चूहेदानी में फंसे मूषक जी महाराज की विदाई. मूषक और जी! अरे भाई गणोश जी की सवारी है. इज्जत तो देनी है. और फिर गणोश जी ही तो सद्बुद्धि देते हैं. विदाई से पहले मूषक जी से […]

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वीर विनोद छाबड़ा

सेवानिवृत्त अधिकारी

(फेसबुक वॉल से साभार)

सुबह मुंह-अंधेरे उठ कर सबसे पहला काम होता है, चूहेदानी में फंसे मूषक जी महाराज की विदाई. मूषक और जी! अरे भाई गणोश जी की सवारी है. इज्जत तो देनी है. और फिर गणोश जी ही तो सद्बुद्धि देते हैं.

विदाई से पहले मूषक जी से चंद बातें भी करनी जरूरी हैं. प्रोटोकॉल भी आखिर कोई चीज है. घर आये मेहमान को बिना स्वागत-सत्कार किये बाहर कर देना, गंगा-जमुनी तहजीब की बेइज्जती है. भारतीय संस्कृति के भी विरुद्ध है.

कब आये? अंदर रखी रोटी का टुकड़ा कतर लिया? लीजिये, एक ब्रेड पीस का मुलायम टुकड़ा कतरिये. तब तक जूता पहन लूं. फिर हम चूहेदानी उठाते हैं. झूले की तरह झुलाते हैं. मूषक भाई की सवारी चली पम पम पम.. ध्यान रखते हैं कोई मिल न जाये. वरना कमेंट सुनने पड़ते हैं- बड़ा दुबला है. घर में खाने-पीने को कुछ है नहीं क्या?

हम घर के सामने से गुजर रही चार लेन वाली सीतापुर रोड पार करते हैं. वहां एक नाला है.

हरदम कूड़े से भरा रहता है. वहीं हम मूषक जी को विदा करते हैं. विदा करने से पूर्व अच्छी तरह जांच लेते हैं. कोई बिल्ली मौसी घात लगा कर न बैठी हो. चूहेदानी का पट खुलते ही मूषक जी लंबी छलांग लगाते हैं. और फिर पलट कर हमें कुछ क्षण तक घूरते हैं.

मानो चिढ़ा रहे हों- खुश होने की जरूरत नहीं बच्चू. तैयार रहना, लौट कर आ रहा हूं. हमें अहंकार होता है. हम हंसते हैं. यह मुंह और मसूर की दाल! मियां, घर से पांच सौ मीटर दूर हैं आप. बीच में भारी वाहनों का लगातार आवागमन. सावधानी हटी नहीं कि दुर्घटना घटी.

यों मूषक जी के संदर्भ में हम अपना अब तक का इतिहास जब भी खंगालते हैं, तो पाते हैं कि मूषक जी से हमारा पैदाइशी रिश्ता है. खुन्नस से भरपूर. कभी हम आगे तो कभी मूषक जी. और पीछे-पीछे चूहेदानी लेकर हम. बचपन से जवानी तक रेलवे स्टेशन के सामने रहे.

पार्सल ऑफिस से चहल-कदमी करते हुए पांच-पांच किलो के भारी-भरकम खलिहानी मूषक महाराज आते थे. बड़ी-बड़ी बिल्लियां भी डर जाती थीं. फिर बत्ती विभाग में नौकरी मिली. वहां भी ऐसे ही मजबूत किस्म के मूषक. फाइलों की स्पाइन पर लगी लेई के बहाने फाइलें चट कर जाते. दराजों में रखा खाने का कोई भी सामान कभी भी महफूज नहीं रहा. इंदिरा नगर आये. खेतों और फलों के बगीचों को उजाड़ कर बने मकान. किसान मुआवजा लेकर चले गये. मगर मूषकगण वहीं रह गये.

बहरहाल, एक दिन हमें संदेह हुआ. क्या मूषक जी वाकई लौट आते हैं? संदेह का निवारण जरूरी होता है. वरना हमारी खोपड़ी भन्नाई रहती है. न दिन में चैन और न रात में नींद आये.

हमने एक मित्र के सुझाव पर प्रयोग किया. एक दिन कैदी मूषक जी पर हमने पक्का लाल रंग छिड़क दिया. ऐसा हमने कई दिन तक किया. देखें मूषक जी वाकई लौटते हैं या महज हमें डराते हैं. हमने कई दिन तक नजर रखी. मगर हमें लाल रंग वाले एक भी मूषक जी लौटे हुए नहीं दिखे. तब जाकर हमें इत्मीनान हुआ कि मूषक जी चूहेदानी से बाहर निकल कर हमें चिढ़ाते नहीं हैं, बल्कि वे आजाद करने का शुक्रिया अदा करते हैं..

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