हत्या ही है किसान आत्महत्या
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :02 Sep 2015 12:35 AM (IST)
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विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार तेलंगाना के मेडक जिले का एक गांव है रयावरम. सात साल का वम्शी इसी गांव के स्कूल में पढ़ता है. उस दिन वम्शी के पिता अचानक स्कूल आये थे.बेटे को कक्षा से बुला कर स्कूल के पास की एक चाय की दुकान पर ले गये. उसे बन खिलाया. चाय पिलायी. पांच […]
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विश्वनाथ सचदेव
वरिष्ठ पत्रकार
तेलंगाना के मेडक जिले का एक गांव है रयावरम. सात साल का वम्शी इसी गांव के स्कूल में पढ़ता है. उस दिन वम्शी के पिता अचानक स्कूल आये थे.बेटे को कक्षा से बुला कर स्कूल के पास की एक चाय की दुकान पर ले गये. उसे बन खिलाया. चाय पिलायी. पांच रुपये दिये और मन लगा कर पढ़ने की सलाह दी. सात साल का वम्शी पिता के व्यवहार को समझ नहीं पा रहा था. पर उसे अच्छा लगा था कि पिता ने बन खिलाया.
फिर पिता ने बेटे के सिर पर दुलार से हाथ रख कर कहा था, ‘कभी किसान मत बनना’. वम्शी इस बात को भी समझ नहीं पाया. फिर उसके किसान पिता उसे स्कूल में छोड़ कर चले गये. फिर कभी नहीं लौटे. उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.
यह खबर तो अखबारों में छपी थी, पर इसका वही हश्र हुआ, जो बरसों से देश में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या के खबरों के साथ होता है.
आत्महत्याओं के संदर्भ में पसरती चुप्पी जारी है. पिछले 19 वर्षो में सवा तीन लाख से अधिक किसान देश में आत्महत्या कर चुके हैं. पर अब संख्या की बात ही नहीं होती. कहा जा रहा है कि अच्छे दिन आ रहे हैं.
पर आंकड़े बताते हैं कि बीते एक साल में किसानों की आत्महत्याओं की दर में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई है! रोज किसानों की हालत सुधारने के दावे और वादे किये जा रहे हैं.
पर यह सवाल कोई शासक नहीं पूछ रहा कि वम्शी के पिता ने उसे ‘कभी किसान न बनने की सलाह क्यों दी थीं,’ और किसी को इस बारे में सोचने की परवाह नहीं है कि क्या किया जाये कि किसानों को किसानी अभिशाप न लगे. आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2011 के बीच देश में लगभग 90 लाख लोगों ने खेती छोड़ दी है!
शरद पवार जब देश के कृषि मंत्री थे, तो उन्होंने किसानों को सलाह दी थी कि खेती की जमीन के लगातार कम होते जाने को देखते हुए जरूरी है कि वे अपने बच्चों को खेती के अलावा अन्य व्यवसायों में जाने के लिए प्रेरित करें. देश के कृषि मंत्री के मुंह से यह बात सुन कर तब बहुतों को झटका लगा था.
कृषि मंत्री का काम बेहतर कृषि की स्थितियां बनाना होता है, निराशा का माहौल बनाना नहीं. बेहतर होता यदि वे खेती से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देनेवाली नीतियों की घोषणा करते. पर इस दिशा में तब की सरकार और अब की सरकार द्वारा कोई गंभीर चिंतन किया जा रहा हो, ऐसा न तब लगा था, न अब लग रहा है.
किसान की जीवन-स्थितियों में कोई सुधार दिखाई नहीं दे रहा. जब कोई किसान आत्महत्या से पहले अपने बेटे से कहता है कि ‘कभी किसान मत बनना’, तो यही लगता है कि देश में किसानी अभिशाप बनती जा रही है.
सरकार को बिहार का चुनावी दंगल देश के किसानों की त्रसदी से ज्यादा महत्वपूर्ण लग रहा है और मीडिया को लग रहा है किसानों की आत्महत्याओं की बात करने से कहीं अधिक टीआरपी किसी राधेमां का तमाशा दिखाने में मिलेगी.
किसानों की आत्महत्याओं के रूप में जो मानव-त्रसदी सामने आ रही है, उसे देख कर तो यही लगता है कि हमारी केंद्र और राज्य सरकारों के पास इसका कोई समाधान नहीं है.
कर्नाटक में पिछली 1 जुलाई से लेकर 10 अगस्त तक के 41 दिनों में 245 किसानों ने आत्महत्या की थी.वम्शी का पिता इन्हीं अभागों में से एक था. राज्य के मुख्यमंत्री ने इस स्थिति के संदर्भ में सिर्फ यही कहा है कि वे इस बार अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में कोई धूम-धाम नहीं चाहते. वे चाहते हैं कि दशहरा भी धूम-धाम से न मनाया जाये.
पर ऐसा कुछ नहीं दिख रहा, जिससे यह लगे कि सरकार इस त्रसदी के कारणों का पता लगा कर उसके निवारण के प्रति गंभीर है. महाराष्ट्र में भी किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है. सरकारी आकड़ों के अनुसार, इस वर्ष के पहले छह महीनों में महाराष्ट्र में 1,300 किसानों ने आत्महत्या की है. वर्ष 2014 में कुल 1981 किसानों ने आत्महत्या की थी. अर्थात्, किसानों की आत्महत्या का क्रम और गति बढ़ गयी है.
ये आंकड़े सिर्फ मरनेवालों की संख्या भर नहीं हैं, ये इस बात का भी उदाहरण हैं कि जिस खेती पर देश की सत्तर प्रतिशत जनता निर्भर करती है, उसके बारे में शासकों में ईमानदारी और गंभीरता का नितांत अभाव है.
नेताओं में कृषि को लेकर किसी ठोस नीति के बारे में ईमानदार सोच की कमी है. जरूरत एक ऐसी कृषि-नीति की है, जो किसानों की जमीनी हकीकत और देश की जरूरतों से जुड़ी हो. जरूरत ऐसी व्यवस्था की है कि किसान को उसकी मेहनत के अनुरूप मेहनताना मिल सके.
वह दिन कब आयेगा, जब देश का प्रधानमंत्री किसानों से पूछेगा, बताओ तुम्हें कितनी और कैसी सहायता चाहिए? ऐसी सोच राष्ट्रीय नीति का हिस्सा होना चाहिए, किसी चुनावी आवश्यकता का परिणाम नहीं.
आज देश के किसानों को हर तरह की मदद की जरूरत है. इस संदर्भ में शासक-वर्ग में अपेक्षित ईमानदारी है. इस ईमानदारी का तकाजा है कि हम यह समङों कि किसानों की आत्महत्या वस्तुत: हत्या ही है!
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