वैचारिक क्रांति की दरकार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :01 Sep 2015 11:42 PM (IST)
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राष्ट्रीयता की भावना का ह्रास होता जा रहा है बढ़ती धनलिप्सा है सबको हिला रही अपनी रहनुमाओं की करनी पर लोकतंत्र मौजूदा दौर में है आंसू बहा रहा देश से भी बड़ा बनने की होड़ में हर दल है अपना भाग्य आजमा रहा दल का हर व्यक्ति, दल से बड़ा बनना चाहता दल पर भी […]
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राष्ट्रीयता की भावना का ह्रास होता जा रहा है
बढ़ती धनलिप्सा है सबको हिला रही
अपनी रहनुमाओं की करनी पर लोकतंत्र
मौजूदा दौर में है आंसू बहा रहा
देश से भी बड़ा बनने की होड़ में
हर दल है अपना भाग्य आजमा रहा
दल का हर व्यक्ति, दल से बड़ा बनना चाहता
दल पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे
किंकर्तव्यविमूढ़ जनता अब हो गयी
हर-जन का उचित सम्मान मिटा जा रहा
‘वैचारिक-क्रांति’ की हमें है जरूरत
नीति विहीन घूंट का जहर जो पिला रहा
दिवाकर प्रसाद, सरमेरा, नालंदा
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