मूल्यों का क्षरण
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :28 Aug 2015 11:18 PM (IST)
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मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना जाता है, क्योंकि उसका व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन नैतिक मूल्यों से संचालित होता है. इन नैतिक मूल्यों के निरंतर परिष्कार को ही सभ्यता और संस्कृति के विकास की संज्ञा दी जाती है. हजारों वर्षो के ऐतिहासिक विकास की यात्रा में ऐसे भी मोड़ आते हैं, जब लालच, हिंसा और घृणा […]
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मनुष्य को सामाजिक प्राणी माना जाता है, क्योंकि उसका व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन नैतिक मूल्यों से संचालित होता है. इन नैतिक मूल्यों के निरंतर परिष्कार को ही सभ्यता और संस्कृति के विकास की संज्ञा दी जाती है.
हजारों वर्षो के ऐतिहासिक विकास की यात्रा में ऐसे भी मोड़ आते हैं, जब लालच, हिंसा और घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों के कारण मूल्यों का क्षरण होता है और सभ्यताएं संकट में पड़ती दिखती हैं. मुंबई का बहुचर्चित शीना बोरा हत्याकांड हमारे वर्तमान के ह्रास का ही एक संकेत है.
अगर यह अपने तरह की पहली घटना होती, तो इसे मानसिक असंतुलन और अवसाद से ग्रस्त एक मां द्वारा बेटी की हत्या या विशेष परिस्थितियों में फंसे परिवार में घटित एक अपवाद के रूप में देखा जा सकता था.
लेकिन, आर्थिक व सामाजिक लाभ के लिए परिजनों की हत्या तथा समाज एवं विधि द्वारा निर्धारित वजर्नाओं से परे यौन संबंध अब आये दिन खबरों में सुनने-पढ़ने को मिलते हैं.
इस अपराध-वृत्त में अगर रिश्तेदारों, मित्रों और सहयोगियों को शामिल कर लें, तो हमारे समाज की एक भयावह तस्वीर उभरती है, जिसमें भरोसा जैसी जरूरी चीज का अस्तित्व खत्म होता दिख रहा है.
पुलिस और मीडिया के हवाले से शीना बोरा हत्याकांड के जो तथ्य अब तक सामने आये हैं, वे मां-बाप, पति-पत्नी, मां-बेटी, भाई-बहन आदि जैसे सभी पवित्र संबंधों पर सवालिया निशान लगाते हैं.
किसी भी अच्छे-बुरे मौके पर व्यक्ति को सबसे अधिक इन्हीं संबंधों का आसरा रहता है. परंतु आधुनिक सभ्यता में जोंक की तरह चस्पा हो रहे पैसा, ताकत, शोहरत की ललक ने धनलोलुपता और शारीरिक हवस को हर नीति-नियम की परिधि से परे कर दिया है.
हालांकि भ्रष्टाचार और दावं-पेच से भौतिक सुख हासिल करना, मानव प्रवृत्ति के लिए कोई नयी बात नहीं है, लेकिन अपनों की बलि देकर, उन्हें धोखे में रख कर, उनके भरोसे की कीमत पर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सफलता अजिर्त करने का ऐसा घृणित वातावरण गंभीर चिंता का सबब बन रहा है.
इंद्राणी मुखर्जी के जीवन की जटिलता और उसके अपराध की गंभीरता के साथ हमें इस पर भी गहन सोच-विचार करना चाहिए कि सफलता की वह कौन-सी अवधारणा है, जो हमारे समाज को ऐसे पिशाचों के हुजूम में बदल रहा है, जहां हमारी प्यास अपनों के खून से तृप्त होती है.
इस हत्याकांड के सारे पेच अभी खुलने बाकी है, पर इसे एक रोमांचक सनसनी की तरह नहीं, बल्कि सभ्यता की भयावह त्रसदी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए.
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