हार्दिक के बयान

Published at :27 Aug 2015 10:36 PM (IST)
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हार्दिक के बयान

हार्दिक पटेल के नेतृत्व में गुजरात के पाटीदार पटेलों का आरक्षण के लिए आंदोलन राज्य के राजनीतिक एवं सामाजिक परिवेश में एक भूचाल के रूप में आया है.करीब 22 साल की उम्र में ही पटेल के तेवर से राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी स्तब्ध हैं. चूंकि मसला जाति और आरक्षण का है, तो इनसे संबंधित बहसें […]

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हार्दिक पटेल के नेतृत्व में गुजरात के पाटीदार पटेलों का आरक्षण के लिए आंदोलन राज्य के राजनीतिक एवं सामाजिक परिवेश में एक भूचाल के रूप में आया है.करीब 22 साल की उम्र में ही पटेल के तेवर से राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी स्तब्ध हैं. चूंकि मसला जाति और आरक्षण का है, तो इनसे संबंधित बहसें भी जोर पकड़ रही हैं. इन बहसों का एक सिरा हार्दिक पटेल के बयान हैं, जो पटेल समुदाय की भावनाओं और मांगों को अभिव्यक्त करते हैं.

उन्होंने इस आंदोलन को ‘अधिकारों की लड़ाई’ कहते हुए सरकार को चुनौती दी है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे इस अधिकार को ‘ताकत के दम पर’ भी हासिल करने से परहेज नहीं करेंगे. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शांति और अहिंसा से अगर उनकी मांग पूरी नहीं हुई, तो वे ‘हिंसा का रास्ता चुनने से भी नहीं डरेंगे’.

पटेलों को आरक्षण मिलना चाहिए या नहीं, यह अलग बहस और नीतिगत निर्णय का मसला है, लेकिन हार्दिक के आंदोलन को मिल रहे व्यापक समर्थन ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि गुजरात के विकास की उपलब्धियों से यह तबका संतुष्ट नहीं है. हार्दिक के बयानों से जो आक्रोश झलक रहा है, वह कृषि-संकट और विषम व्यापारिक प्रगति से पैदा हुई चिंता का परिणाम है.

यह एक तथ्य है कि राज्य में आत्महत्या करनेवाले किसानों में बड़ी संख्या पटेल समुदाय के लोगों की है. कारोबार में पटेलों का अच्छा दखल है, पर सभी पटेल व्यवसायी नहीं हैं. अच्छी शिक्षा एवं सम्मानजनक रोजगार उनकी महत्वपूर्ण आकांक्षाएं हैं और इसकी समुचित व्यवस्था की जिम्मेवारी सरकारों की है.

गुजरात ही नहीं, पूरे देश में सरकारी शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में लगातार गिरावट हो रही है. गरीब मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था भी ठीक नहीं है. आंकड़ों के आधार पर विकास के बड़े-बड़े दावे तो होते रहे हैं, लेकिन इससे रोजगार के अवसरों में अपेक्षित वृद्धि न होने की चिंता पर हमारे नीति-निर्धारकों का ध्यान नहीं रहा है.

कृषि की आय में लगातार कमी और शहरों में रोजगार की स्थितियों के ह्रास ने युवाओं में कुंठा और क्षोभ की भावना ने घर कर लिया है. गुजरात के इस आंदोलन में युवाओं की महती भागीदारी का यही कारण है. इससे पहले राजस्थान के जाट और गुजर्र समुदाय के आंदोलनों में भी यह बात देखी जा सकती है. देश के कुछ क्षेत्रों में गाहे-बगाहे अन्य राज्यों के लोगों के विरुद्ध हिंसा के पीछे भी असुरक्षा की भावना ही काम करती है.

देश में कई दशकों से जो कल्याणकारी योजनाएं बनी हैं, वित्तीय अनुदान के कार्यक्रम चलाये गये हैं या आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं की गयी हैं, इन सभी का अपेक्षित लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच सका है. देश में गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, बीमारी, शोषण आदि के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि आजादी के सात दशकों में सरकारें अपनी जिम्मेवारी संतोषजनक रूप से नहीं निभा सकी हैं.

कहना गलत नहीं होगा कि इन समस्याओं के समाधान और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए देश की राजनीति में अपेक्षित दूरदर्शिता का अभाव रहा है. दुर्भाग्य से, ज्यादातर राजनीतिक दलों ने जनता की मुश्किलों को जातिवाद, क्षेत्रवाद और संप्रदायवाद का रंग देकर सत्ता पाने और स्वार्थ साधने का जरिया बना लिया है.

अब यह जरूरी हो गया है कि हमारे राजनेता लोगों की बुनियादी जरूरतों पर ईमानदारी से विचार करें.हर बच्चे को बेहतर शिक्षा और उसकी क्षमता तथा कौशल के अनुरूप रोजगार मुहैया कराना सरकारों की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. अगर अवसर और विकास कुछ तबकों तक सीमित रह जायेंगे, तो आबादी का बड़ा हिस्सा स्वाभाविक रूप से क्रुद्ध होगा. जरूरी नहीं है कि यह आक्रोश हमेशा शांतिपूर्ण ही हो या मुद्दे पर ही केंद्रित हो. गांधी और आंबेडकर का नाम हम बहुत लेते हैं, पर सच यह है कि अधिकतर आंदोलनों की प्रवृत्ति हिंसात्मक ही रही है.

अफसोस की बात यह भी है कि कई बार आंदोलनों को बदनाम करने या दबाने के लिए राज्य भी हिंसा का सहारा लेता है. इन बातों के आलोक में गुजरात की घटनाएं सिर्फ आरक्षण ही नहीं, बल्कि कई सारे पहलुओं पर सोच-विचार करने का मौका दे रही हैं. गुजरात एक विकसित राज्य है.

अगर उसकी विकास-गाथा में पटेल समुदाय जैसा सक्षम समूह भी असंतुष्ट है, तो हमें विकास की दशा और दिशा पर कुछ देर ठहर कर सोचने की जरूरत है. इस विकास में किसान और गांव किस हद तक हिस्सेदार हैं या होने चाहिए, इस पर भी मंथन आवश्यक है.

इसलिए आरक्षण की प्रासंगिकता पर बहस में उलझने की बजाय, ऐसी कोशिशें होनी चाहिए, जिनसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तक सबकी पहुंच सुलभ हो. पिछड़ों के साथ-साथ सबका विकास इसी में निहित है. ऐसा नहीं किया गया, तो देश अस्थिरता की ओर जा सकता है.

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