टीकापुर कांड से नेपाल क्या सबक ले?

Published at :26 Aug 2015 11:45 PM (IST)
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टीकापुर कांड से नेपाल क्या सबक ले?

पुष्परंजन दिल्ली संपादक, ईयू-एशिया न्यूज सुदूर पश्चिम नेपाल का टीकापुर अब खूबसूरत पार्क के लिए नहीं, बर्बरता के लिए दुनियाभर में जाना जायेगा. कैलाली अंचल का टीकापुर, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से मात्र 102 किमी की दूरी पर है, जहां नेपाल में अलग थरूआन की मांग करनेवाले आंदोलनकारी इतने आतातायी हो गये कि वहां पर […]

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पुष्परंजन
दिल्ली संपादक, ईयू-एशिया न्यूज
सुदूर पश्चिम नेपाल का टीकापुर अब खूबसूरत पार्क के लिए नहीं, बर्बरता के लिए दुनियाभर में जाना जायेगा. कैलाली अंचल का टीकापुर, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से मात्र 102 किमी की दूरी पर है, जहां नेपाल में अलग थरूआन की मांग करनेवाले आंदोलनकारी इतने आतातायी हो गये कि वहां पर तैनात घनगढ़ी के एसएसपी लक्ष्मण न्योपाने समेत सात पुलिसकर्मियों के टुकड़े कर दिये.
हेड कांस्टेबल राम बिहारी चौधरी को जिंदा जला दिया गया. निहायत ही उस नृशंस हिंसा में दो साल का एक बच्चा भी मारा गया है. दर्जनों पुलिस वाले गंभीर रूप से घायल हैं. इस घटना से नेपाल ही नहीं, पूरा विश्व स्तब्ध है. कैलाली में कर्फ्यू है, नेपाली सेना ने स्थिति को नियंत्रण में ले लिया है.
विपक्षी एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के उपाध्यक्ष नारायण काजी श्रेष्ठ को शक है कि यह प्रपंच संविधान निर्माण के अंतिम चरण को रोकने के लिए किया गया है, ताकि यह काम 2015 में भी टल जाये. यह शक सही भी हो सकता है. लेकिन जो कुछ टीकापुर में हुआ, उसके लिए क्या सुशील कोइराला सरकार दोषी नहीं है?
13 अगस्त, 2015 को कैलाली में किसी मधेस नेता ने जनता से आह्वान किया था कि इस इलाके में जो पहाड़ी हैं, उन्हें खदेड़ कर पहाड़ पर भेज दो.
इस बात को लेकर पहाड़ बनाम थरूआन में ठन गयी थी. सुशील कोइराला सरकार के पास इसकी खुफिया जानकारी थी कि थारू बहुल संवेदनशील टीकापुर के लोग संविधान निर्माण में देश के सीमांकन के सवाल को लेकर गुस्से में हैं, और कभी भी हिंसा हो सकती है. खुफिया विभाग को ऐसी आशंका थी, तभी हिंसा से पहले इस इलाके में निषेधाज्ञा लागू की गयी थी.
कर्फ्यू का उल्लंघन कर कोई तीन हजार की संख्या वाली भीड़ ने थरूहट संघर्ष समिति के नेता रेशम चौधरी के स्वामित्व वाली फुलवारी एफएम, फुलवारी रिसॉर्ट, सभासद जनकराज चौधरी का घर, थारूओं के अगुआ शिवनारायण चौधरी के निरू ट्रेडर्स में आग लगा दी. टीकापुर हिंसा व आगजनी कांड के सिलसिले में बुधवार तक छह लोग पकड़े गये. सरकार ने एक उच्च स्तरीय छानबीन समिति गठित की है, जिसके अध्यक्ष राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के पूर्व प्रमुख देवीराम शर्मा नियुक्त किये गये हैं.
नेकपा (माले), चुरेभांवर राष्ट्रीय एकता पार्टी नेपाल के प्रवक्ताओं, थारू नेता बिरमन चौधरी ने इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की है. टीकापुर की आग तराई के दूसरे क्षत्रों में फैल गयी है. कंचनपुर, धनगढ़ी से लेकर पर्सा, बारा, रौतहट, सरलाही, मोरंग जिले गरम हैं. बारा जिला मुख्यालय ‘गौर’ में हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई है, 24 प्रदर्शनकारी रबर बुलेट से घायल हैं.
प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने कहा है कि जिसे भी संविधान के मसौदे से असहमति है, वह संविधान सभा में आकर अपनी आपत्ति दर्ज कराये. सरकार अब तक नींद में क्यों थी, यह जानकर आश्चर्य होता है. 1 जुलाई, 2015 को सरकार ने संविधानसभा में नये संविधान का पहला मसौदा रखा. उसकी प्रतिक्रिया में बीरगंज में मधेस जनाधिकार फोरम के नेता प्रोफेसर भाग्यनाथ गुप्ता ने संविधान मसौदे की कॉपी जलायी.
भाग्यनाथ 2007 में भी ऐसा कर चुके हैं. 2 जुलाई, 2015 को ‘संयुक्त मधेसी फ्रंट’ के चार घटक ‘तराई मधेस लोकतांत्रिक पार्टी’, ‘संघीय समाजवादी फोरम नेपाल’, ‘सद्भावना पार्टी’ और ‘तराई-मधेस सद्भावना पार्टी’ ने काठमांडो से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में संविधान मसौदे की प्रतियां जलायीं.
मधेसी पार्टियों ने ऐलान किया है कि प्रदर्शन के दौरान किसी तराईवासी की मौत होती है, तो उसके परिजनों को पचास लाख रुपये दिये जायेंगे. यह खतरनाक ऐलान है, जिससे ‘राजनीतिक आत्मघाती’ भी तैयार हो सकते हैं. बजाय इसके, मधेस का राजनीतिक तापमान सामान्य करने के तरीके पर बात होनी चाहिए.
सरकार की छवि इस समय यह बनी हुई है कि ‘एक मधेस एक प्रदेश’ की मांग खारिज कर मधेस को बांटना तय किया है.इस समय जो दल संविधान बनाये जाने के प्रति गंभीर हैं, उनमें नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, राष्ट्रीय जनमोर्चा के साथ कुछ निर्दलीय सभासद एक तरफ हैं. सुशील कोइराला सरकार को चाहिए कि चार पार्टियों के समर्थन का अहंकार त्याग कर तराई, थरूआन, चूरे भांवर और पहाड़ के विभिन्न नेताओं का एक महासम्मेलन बुलाये और आम सहमति से संविधान का प्रारूप तय करे.
नेपाल के थारू, अलग ‘थरूआन’ (थरूअट प्रदेश) की मांग कोई पहली बार नहीं कर रहे हैं. उन्हें हिंसा के लिए उकसाया गया है, इस बात को नेपाल की राजनीति को गहराई से समझनेवाले महसूस कर रहे हैं. नेपाल की पुलिस ने संयम का परिचय दिया है, टीकापुर कांड इसका सबसे बड़ा सुबूत है.
यह सच है कि कोइराला सरकार ने तराई से उठ रहे विरोध के स्वर को सुनने की परवाह नहीं की. यह सरकार के दंभ को दर्शाता है. पता नहीं नेपाली सत्ता प्रतिष्ठान को क्यों लगता है कि मोदी जी हमारे साथ हैं, तो तराई में विरोध के स्वर को हम दबा देंगे. यह विचित्र है कि संविधान निर्माण में क्या हो रहा है, उसकी साप्ताहिक ब्रीफिंग के लिए नेपाल का कोई न कोई नेता नयी दिल्ली में मौजूद दिखता रहा है.
कुछ नेता इस उम्मीद से दिल्ली आते रहे कि मोदी जी, विहिप और संघ के नेता ‘आशीर्वाद’ दें, तो हिंदू राष्ट्र का सपना साकार हो जाये. ऐसे ‘राजनीतिक तीर्थाटन’ का मतलब क्या है? यह खतरनाक स्थिति है, जो कमजोर सुशील कोईराला सरकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता को दर्शाती है.
इस समय नेपाल में सरकारी कामकाज 2007 के अंतरिम संविधान के आधार पर चल रहा है.राजशाही के दौरान निर्मित 1990 के संविधान को निरस्त करने की प्रक्रिया अप्रैल 2006 में ‘दोस्ने जन आंदोलन’ के बाद आरंभ हो गयी. नेपाल की राजनीति में कितना ‘कन्फ्यूजन’ है, उसका सबसे बड़ा नमूना ‘नया संविधान निर्माण’ बन गया है. टीकापुर हिंसा कांड को लेकर नेपाल, दूसरी बार शर्मसार हुआ है. 20 जनवरी, 2015 को रात्रि डेढ़ बजे नेपाली संसद में धक्का-मुक्की और मार-पिटाई के दृश्य को अभी दुनिया भूली नहीं है. संसद में मारपीट के दो दिन बाद, 22 जनवरी, 2015 को संविधान पेश हो जाना था, और उस पर राष्ट्रपति को हस्ताक्षर कर देना था.
मगर, 22 जनवरी को नेपाली संसद में दस पैकेट लाल मिर्ची पाउडर की बरामदगी हुई और कुछ सांसदों ने संदेश दिया कि हम जिम्मेवार लोग नहीं हैं. किसी ने सही कहा है, ‘यथा राजा, तथा प्रजा’. ‘प्रश्नावली निर्माण समिति’ और मसौदा बनाने के प्रश्न पर जब सांसदों ने शालीनता नहीं दिखायी, तो टीकापुर की उग्र जनता से हम समझदारी की उम्मीद कैसे कर सकते थे!
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