पाक से बात : दर्द अपना और प्रीत परायी

Published at :22 Aug 2015 3:01 AM (IST)
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पाक से बात : दर्द अपना और प्रीत परायी

पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार मोदी सरकार के लिए कल पहला दिन होगा, जब पाकिस्तान के साथ कोई आधिकारिक स्तर की बातचीत का श्रीगणोश होगा. यानी सवा साल लग गये बातचीत की टेबल पर आने के लिए,जबकि ताजपोशी के अगले ही दिन 27 मई, 2014 को प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के उसी हैदराबाद हाउस में […]

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पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार
मोदी सरकार के लिए कल पहला दिन होगा, जब पाकिस्तान के साथ कोई आधिकारिक स्तर की बातचीत का श्रीगणोश होगा. यानी सवा साल लग गये बातचीत की टेबल पर आने के लिए,जबकि ताजपोशी के अगले ही दिन 27 मई, 2014 को प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के उसी हैदराबाद हाउस में डेढ़ घंटे तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात की थी, जिस हैदराबाद हाउस में कल पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज से अजीत डोभाल मुलाकात करेंगे.
यह सवाल हर जहन में कल जरूर उठेगा कि 27 मई, 2014 और 23 अगस्त, 2015 के दरम्यान दोनों देशों के बीच फासले कितने कम हुए. या फिर वह कौन से हालात हैं, जिसने दोनों देशों को बातचीत की टेबल पर ला दिया.
हालात बिल्कुल उलट हैं, फिर भी बातचीत होगी. मोदी सरकार ने ठीक साल भर पहले जिस हुर्रियत को वजह बना कर विदेश सचिवों की बातचीत रद्द करने का निर्णय लिया था, वही हुर्रियत अब कहीं ज्यादा बड़े दायरे में दिल्ली में उन्हीं सरताज अजीज के साथ मुलाकात करेगा, जिनके साथ भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को बात करनी है.
यानी मोदी सरकार की पहली रणनीतिक हार कश्मीर के उन्हीं अलगाववादियों को लेकर हो गयी, जिसे खारिज कर पहले पाकिस्तान और फिर जम्मू-कश्मीर चुनाव में अपनी जमीन तैयार करने का रास्ता तेवर के साथ दिखाया-बताया गया. दूसरी स्थिति आतंकवाद को लेकर समझौता करने का है या यह मानने का है कि आतंकवाद पाकिस्तान की स्टेट पॉलिसी नहीं है.
मुबंई हमलों के वक्त ही जब लश्कर-ए-ताइबा का फिदाइन अजमल कसाब जिंदा पकड़ में आया था, तब संसद के भीतर पहली आवाज भाजपा की ही उठी थी कि ‘आतंकवाद पाकिस्तान की स्टेट पॉलिसी है और उसके साथ सारे राजनयिक रिश्ते तोड़ देने चाहिए.’ और संयोग देखिए कि कसाब के बाद जो दूसरा पाकिस्तानी आतंकवादी जिंदा पकड़ में आया, वह नावेद है.
पंजाब में गुरदासपुर पर हमला हो या जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में, दोनों हमलों को लेकर संसद में देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जवाब यही दिया कि आतंकी हमला करनेवाले पाकिस्तान से आये. फिर आतंकी नावेद से पूछताछ में जब यह सच भी सामने आ गया कि लश्कर ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ के आला अधिकारियों से भी नावेद की मुलाकात हुई. तो क्या कल की मुलाकात पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की दूसरी बड़ी रणनीतिक हार नहीं होगी?
सीमा पर मौजूदा हालात कहीं ज्यादा तेजी से बिगड़े हैं.
सीजफायर उल्लंघन से आगे रिहाइशी इलाकों में भी गोलीबारी ने आम नागरिकों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर किया है. यानी पाकिस्तानी सेना का रुख भारत के साथ बातचीत का नहीं है और यह बात आज भी भारत की ही खुफिया एजेंसी रॉ भी मान रही है, और इससे पहले भी मान रही थी. 26/11 के बाद संसद में ही भाजपा ने कहा कि सेना को पाकिस्तान के कब्जेवाले कश्मीर में घुस जाना चाहिए.
सरसंघचालक मोहन भागवत भी दो बार दशहरा के मौके पर नागपुर में शस्त्र पूजा के बाद यह बोलने से नहीं चूके कि अखंड भारत ही असल भारत है.
इसके लिए सेना को युद्ध करना होगा, जिसके लिए दिल्ली में बैठी सरकार में नैतिक बल नहीं है. लेकिन सवाल पाकिस्तान के साथ युद्ध का नहीं है, क्योंकि भाजपा के लिए सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान को लेकर हालात इस कदर बदले हैं कि कल की मुलाकात में माना यही जा रहा है कि अजीत डोभाल पीओके में चल रहे आतंकी कैंपों के लोकेशन और समूची जानकारी पाकिस्तान के सरताज अजीज को सौंपेंगे.
2012 में 50 आतंकियों की लिस्ट सौंपी गयी थी. इस बार 65 आतंकियों की सूची सबूतों के साथ सौंपने की तैयारी है. यानी रास्ता घूम-फिर कर उस डिप्लोमेसी की तरफ जा रहा है, जहां नयी बहस यह शुरू हो जाये कि अब पाकिस्तान से बातचीत को लेकर भारत की पॉलिसी बदल रही है. क्योंकि, बातचीत रोकने के बाद भी कोई नतीजा बीते 30 बरस में नहीं निकल पाया है और पाकिस्तानी सरकार लगातार बातचीत बंद करने के लिए भारत पर ही दोष मढ़ती रही है.
तो अब नया सवाल यह भी है कि क्या मोदी सरकार अब पाकिस्तान को कोई ऐसा मौका देना नहीं चाहती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में यह संदेश जाये कि भारत आतंकवाद को ढाल बना कर बातचीत को रोकता रहा है?
ध्यान दें तो मोदी सरकार की पाकिस्तान को लेकर पॉलिसी में कई स्तर पर बदलाव आया है. मसलन अब सीजफायर उल्लंघन का जवाब सीमा पर दिया जा रहा है.
हुर्रियत को पाकिस्तान तरजीह दे, लेकिन भारत कश्मीर में अलगाववादियों को महत्व नहीं देगा. लेकिन इससे होगा क्या, जब पाकिस्तान की बातचीत का आधार ही कश्मीर है और कश्मीर में आतंक की नयी बिसात पढ़े-लिखे युवा कश्मीरियों के हाथों में लहराते आइएसआइएस के झंडे तले बिछ रही है, जिस पर पाकिस्तान में हाफिज मोहम्मद सईद गर्व करते हैं (14 अगस्त, 2015 को लाहौर में भाषण). लाहौर घोषणापत्र में जब इस बात का खुले तौर पर जिक्र किया गया कि पाकिस्तान अपनी जमीन पर आतंकवादियों को कोई जगह नहीं देगा, तो फिर पाकिस्तान से बातचीत को लेकर पॉलिसी में बदलाव की वजह क्या हो सकती है? यह एक बड़ा सवाल है.
दरअसल, भारत की मुश्किल यही है कि सच और सत्ता के बीच विभाजन की त्रसदी आज भी सियासत करने से नहीं चूकती और कोई भी सत्ता इसी सच और मुश्किल से दो-दो हाथ करने से कतराती है.
मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पाकिस्तान के बदले भारत में रहना चुना, तो उनके मुसलिम नेता बने रहने के लिए नेहरू ने उन्हें कांग्रेस का टिकट रामपुर से दिया, जहां मुसलिम बहुसंख्यक थे. और मौजूदा वक्त में एमआइएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी मोदी की सत्ता में इसलिए खलनायक हैं, क्योंकि उनकी खलनायकी ही बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच भाजपा को चुनावी नायक बनाये रख सकती है.
राष्ट्रवाद की लौ पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने की बात कह कर ही जगायी जा सकती है, चाहे आतंकवाद का दायरा बढ़े या कश्मीर की युवा पीढ़ी दिल्ली के जरिये ही हाशिये पर ढकेले जाने से हैरान-परेशान होकर आतंक की गलियों में भटकने को तैयार होती नजर आये.
क्या सवा साल पहले मोदी-नवाज की साड़ी-शॉल की डिप्लोमेसी और अब सवा साल बाद डोभाल-अजीज की आतंकी कैंप की लोकेशन और आतंकवादियों की नयी सूची सौंपने की डिप्लोमेसी में वाकई कोई अंतर है? क्या इसका जवाब प्रधानमंत्री मोदी देश को दे पायेंगे?
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