‘विकास’ बन रहा एक डरावना शब्द!

Published at :21 Aug 2015 10:10 AM (IST)
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‘विकास’ बन रहा एक डरावना शब्द!

उर्मिलेश, वरिष्ठ पत्रकार इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला तो अब आया है, पर देश के कई बड़े शिक्षाविद् और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ आजादी के बाद से लगातार इस पर जोर देते रहे कि जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी स्तर पर ज्यादा निवेश और ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता, भारत वैश्विक मंच पर बड़ी […]

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उर्मिलेश, वरिष्ठ पत्रकार

इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला तो अब आया है, पर देश के कई बड़े शिक्षाविद् और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ आजादी के बाद से लगातार इस पर जोर देते रहे कि जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी स्तर पर ज्यादा निवेश और ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता, भारत वैश्विक मंच पर बड़ी ताकत के रूप में नहीं उभर सकता. हम एक लाख परमाणु बम, अत्याधुनिक आकाशभेदी तोपें, नयी मिसाइलें तैयार कर लें, तो भी हम महाशक्ति नहीं बन सकते, जब तक हम शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में दुनिया के विकसित देशों की बराबरी नहीं करते. कैसी विडंबना है, ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसा आकर्षक नारा देने वाली सरकार ने हथियारों की खरीद के लिए रक्षा मंत्रलय का बजट बेतहाशा बढ़ाया, पर शिक्षा व स्वास्थ्य का बुरी तरह घटा दिया. जाहिर है, ये दोनों अतिमहत्वपूर्ण क्षेत्र सरकार की वरीयता सूची में नहीं हैं.

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 18 अगस्त के अपने फैसले को शिक्षा तक सीमित रखा है. उसने यूपी सरकार से कहा कि अफसरों, विधायक-सांसद-मंत्री और अन्य प्रमुख ओहदेदारों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ें. इससे स्कूलों की दशा में सुधार होगा. जाहिर है, न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले को अमलीजामा न पहनाने की पूरी कोशिश होगी, क्योंकि यह फैसला अभिजन के स्वार्थ के प्रतिकूल है. अफसर-नेता-न्यायाधीश और बड़े व्यापारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों के बजाय ‘पब्लिक स्कूल’ कहे जानेवाले निजी स्कूलों में ही पढ़ाते हैं. यह सिलसिला कमोबेश अंगरेजों के जमाने से कायम है. आजाद भारत की पहली सरकार चाहती, तो इस परंपरा से निजात पा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. आजाद भारत का देसी प्रभु वर्ग दोहरी शिक्षा प्रणाली को जारी रखने के पक्ष में था. उसकी इच्छानुसार सिलसिला जारी ही नहीं रहा, उसका अभूतपूर्व विस्तार भी हुआ. इस मामले में नेहरू से मोदी तक, सभी सरकारों का रुख समान रहा. क्या यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15, जो नागरिकों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं करने का वादा करता है, के प्रावधान का उल्लंघन नहीं है?

दुनिया के ज्यादातर विकसित पूंजीवादी और लोकतांत्रिक मुल्कों में शिक्षा (माध्यमिक स्तर तक) और स्वास्थ्य सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत हैं. यानी दोनों महत्वपूर्ण विभागों का कामकाज स्वयं सरकार या उसकी एजेंसियां संभालती हैं. कुछ साल पहले की बात है, ब्रिटेन के दौरे पर गये भारतीय संपादकों-पत्रकारों के एक समूह को स्थानीय सरकार ने बर्मिघम के एक स्कूल का जायजा लेने के लिए आमंत्रित किया. उस टीम में मैं भी शामिल था. स्कूल कैंपस में पहुंच कर हम सब स्तब्ध थे. हम पर सैकड़ों साल राज करनेवालों ने अपने देश में कितनी सुंदर और मानवीय शैक्षिक व्यवस्था का इंतजाम कर रखा है. बर्मिघम के उक्त स्कूल में सांसद, मंत्री, बड़े अफसरान और स्थानीय सिटी प्रशासन के सबसे निचली पायदान पर कार्यरत कर्मचारियों के बच्चे साथ-साथ पढ़ रहे थे. लेकिन उनकी नकल करनेवाले हम भारतीयों को ऐसी व्यवस्था हरगिज मंजूर नहीं! दोहरी शिक्षा प्रणाली के प्रति इतनी आसक्ति क्यों?

अब से 25-30 साल पहले तक देश के विभिन्न क्षेत्रों में सरकारी या नगर पालिकाओं द्वारा संचालित सरकारी स्कूलों की हालत आज जैसी बुरी नहीं थी. निम्न-मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय लोगों के बच्चे भी ऐसे स्कूलों में पढ़ते थे. लेकिन आज सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीबों, मजदूरों या उत्पीड़ित समाज के बच्चे ही जाते हैं. अन्य वर्गो के बच्चे विभिन्न स्तर के निजी प्रबंधन में संचालित पब्लिक स्कूलों में पढ़ने जाते हैं. भाजपा शासित महाराष्ट्र और राजस्थान में तो बाकायदा सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है. वहां हजारों सरकारी स्कूल बंद किये गये हैं. राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार अपने राज्य में सरकारी स्कूलों को बंद करने को ‘बड़ा शैक्षिक सुधार’ बताने से नहीं अघाती. देश में निजी स्कूलों का धंधा अरबों रुपये का है. इस धंधे में बड़े बिल्डर, राजनीतिज्ञ, अपराधजगत से जुड़े गिरोहबाज, सभी शामिल हैं.

प्रगति और विकास से जुड़ा दूसरा क्षेत्र है-स्वास्थ्य. इसे लगभग निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है. आर्थिक सुधारों के बाद मानो एक लकीर खींच दी गयी, अगर जान बचानी है, तो निजी अस्पतालों में जाना होगा. सरकारी अस्पतालों की संख्या सीमित है और नये आवासीय क्षेत्रों में कहीं भी सरकारी अस्पताल नहीं खोले जाते. देश के सभी नव-विकसित शहरी इलाकों में शराब की सैकड़ों लाइसेंसी दुकानें खुल रही हैं. हजारों शापिंग मॉल और रेस्तरां हैं, पर नये सरकारी अस्पताल खोजने पर भी नहीं दिखते. गावों का हाल तो और बुरा है. देश में हर साल खुलनेवाले निजी अस्पतालों और जांच घरों की संख्या लाखों में है. हमारे प्रधानमंत्री परदेस-दौरे पर जाते हैं, तो अमूमन वहां प्रवासी भारतीयों से ‘भारत माता की जय’ कराते हैं, ‘सुपरपावर’ बनने में मदद की अपील करते हैं. क्या यह बात सबको मालूम नहीं कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रगति के बगैर महाशक्ति क्या, हम एक खुशहाल देश भी नहीं बन सकते. यूएनडीपी की वल्र्ड हेल्थ रिपोर्ट में हाल तक दुनिया के 191 देशों में भारत 119वें पायदान पर था, जबकि श्रीलंका 91वां स्थान पाकर सेहत के मामले में हमसे बेहतर है. कुपोषण और उपचार-तंत्र के मामले में हमारी स्थिति कई बदहाल अफ्रीकी देशों जैसी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के ताजा शोध बताते हैं कि अपने देश में विकास कार्यक्रम पूरी आबादी को प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि कहीं न कहीं विकास संबंधी हमारी प्राथमिकता में भटकाव है. बेहतर सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं न होने के चलते हर साल 3.25 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी के गर्त में ढकेल दिये जाते हैं. नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता देने की अपील करते रहे हैं, लेकिन किसी सरकार ने उनकी नहीं सुनी.

प्रधानमंत्री ने चुनाव से ऐन पहले बिहार के लिए ‘विशेष पैकेज’ का बड़े नाटकीय ढंग से ऐलान किया. उस कथित पैकेज की वास्तविक स्थिति को लेकर विवाद जारी है. यह कैसी विडंबना है कि उस कथित पैकेज में भी लोक स्वास्थ्य और शिक्षा पर बेहद कम रकम का प्रावधान है. शिक्षा के नाम पर सारा खर्च उच्च शिक्षा के खाते का है. स्वास्थ्य के नाम पर राशि कुछ बड़े अस्पतालों के जीर्णोद्धार या विस्तार के लिए है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या सामुदायिक केंद्रों के लिए कुछ भी नहीं है. ऐसे में केंद्र सरकार विकास की जिस अवधारणा को सामने ला रही है, वह आम जनता का विकास नहीं है, वह तो सिर्फ मुट्ठी भर थैलीशाहों, देसी-विदेशी कंपनियों और ठेकेदारों तक सीमित है. क्या यही विकास है? सचमुच, अपने यहां ‘विकास’ एक डरावना शब्द बनता जा रहा है!

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