बापू के बहाने ताउम्र रही दोस्ती

Published at :05 Oct 2013 8:31 AM (IST)
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बापू के बहाने ताउम्र रही दोस्ती

गांधीजी का जन्मदिन इस तरह से भी याद किया जाता है, यह पहला अनुभव था. देर तक सोचता रहा. गांधी, जो ताउम्र एक-एक पल रचनाऔर उत्पादन में लगाते रहे, लेकिन उनका जन्मदिन सरकारी छुट्टी से मनाया जाता है. पिछले दिन एक ऑटोवाले ने पते की बात की. उसने कहा,‘साहब जल्दी चलिये.’ मैं जल्दी बैठ गया. […]

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गांधीजी का जन्मदिन इस तरह से भी याद किया जाता है, यह पहला अनुभव था. देर तक सोचता रहा. गांधी, जो ताउम्र एक-एक पल रचनाऔर उत्पादन में लगाते रहे, लेकिन उनका जन्मदिन सरकारी छुट्टी से मनाया जाता है.

पिछले दिन एक ऑटोवाले ने पते की बात की. उसने कहा,‘साहब जल्दी चलिये.’ मैं जल्दी बैठ गया. पूछा, ‘तो तुम्हें चलने की क्या जल्दी थी?’ उसने कहा,‘कल गांधीजी का जन्मदिन है न, तो ड्राई डे होगा. इसलिए जल्दी कर रहा था कि दुकान बंद हो जायेगी, तो मिलेगा नहीं.’ गांधी का जन्मदिन इस तरह से भी याद किया जाता है, यह पहला अनुभव था. देर तक सोचता रहा.

गांधी, जो ताउम्र एक-एक पल रचना और उत्पादन में लगाते रहे, उनका जन्मदिन सरकारी छुट्टी से मनाया जाता है. किसान, मजदूर, कुम्हार, लोहार आदि सब काम में लगे रहेंगे, क्योंकि उत्पादक जातियां हैं. जो कलमघिस्सू अनुत्पादक जाति है, जिसे सरकारी कर्मचारी कहते हैं, वह छुट्टी पर रहेगा. होना तो यह चाहिए कि आज तमाम सरकारी लोग उस तरफ रुख करें, जो दबे कुचले हैं. मजबूर हैं, मजलूम हैं. जलालत व जिल्लत की जिंदगी जीने पर मजबूर हैं, उनके साथ, उनके बीच पूरा दिन गुजारें. इसका असर यह होगा कि फिर कोई फाइल ‘पेंडिंग’ में नहीं जायेगी. तुरंत कार्रवाई होगी, क्योंकि हर फाइल पर किसी न किसी मजलूम का चेहरा दिखाई पड़ेगा, जिनके साथ दो अक्तूबर गुजरा है. यही मजबूर, मजलूम गांधी का ईश्वर था.

एक दिन काका (राजेश खन्ना) ने ऐलान कर दिया कि ‘आज मैं नहीं पीऊंगा’. लोधी रोड में यह खबर बन रही थी कि आज काका नहीं पीयेंगे. सांझ सात बजे के करीब ज्यों ही मैं गेट से अंदर घुसा तो काका के सबसे खास अशोक रंधावा ने बताया, ‘साहेब! आज की खबर सुनते जाइये, काका आज नहीं पीयेंगे. जो भी आ रहा है, सब को यही बोल रहे हैं.’ हमने पूछा क्या बात हो गयी? उसने कहा,‘उन्हीं से पूछिए, अच्छा रहेगा.’ मैं अंदर गया. पहुंचते ही शुरू हो गये, ‘साहिब, आज हम नहीं पीयेंगे.’ मैंने कहा, ‘यह तो बहुत अच्छी बात है.’ फिर हम चुप रहे.

नहीं रहा गया तो वे बिल्कुल बच्चों के अंदाज में बोले,‘तो आप यह नहीं पूछेंगे कि क्यों?’ मैंने कहा बिल्कुल नहीं. फिर चुप रहे. फिर बोले,‘साहिब आप बहुत खतरनाक हैं.’ मैंने कहा कि आपसे भी पहले किसी ने मेरे बारे में यह कह रखा है. बोले, वह आपकी प्रेमिका होगी? मैंने कहा,‘आपने कैसे जाना? बहुत संजीदगी से बोले,‘मैं भी तो आपको प्यार करता हूं. सन्नाटा छा गया. फिर अचानक फिल्मी सेट पर चले गये. ओके, लाइट ऑफ, पैक अप और जोरदार ठहाका. ‘देखिये साहिब, आज दो अक्तूबर है. गांधीजी का जन्मदिन. इसलिए आज मैं नहीं पीऊंगा. अब तो आप मान गये न कि मैं गांधी का भक्त हो गया हूं?’ हमने कहा कि यह तो हम उसी दिन समझ गये थे, जिस दिन आप आगे बढ़ कर हमारे पास आये थे और दूसरे दिन के खाने का न्योता दिया था.

अब काका से मुलाकात का किस्सा. दिल्ली में मेरे एक दोस्त हैं नरेश जुनेजा. उनके कई शौक हैं. उसमें से एक है पार्टी देना. एक दिन उनका फोन आया, ‘भाई साहब, कल घर पर एक पार्टी है, आ जाइयेगा.’ मैं पहुंचे. उनका ड्राइंग रूम विदेशी लोगों से भरा था. अंदर पहुंचते ही कहा गया कि आप बेडरूम में चले जाइये. मैं वहां गया. वहां फिल्म वितरक, फिल्मवाले, कई डॉक्टर पहले से ही मौजूद थे. उनमें एक सोफे पर गीतकार संतोषानंद धंसे पड़े मिले. मुङो देखते ही आवाज लगायी, ‘देखो भाई अकेले फंसा पड़ा हूं. संघियों ने घेर रखा है.’ (संतोषानंद मनोज कुमार की फिल्मों के लिए गाने लिखते थे और फिल्मी दुनिया में कांग्रेसी मान लिये गये थे) मैंने पूछा कितनी देर से चल रहा है. डॉ कसाना ने कहा अभी दूसरा ही है. मैंने हंसते हुए कहा, ‘रुकिये, हमें भी लेबिल पर आने दीजिये.’ इतने में हमारे दोस्त गिप्पी (सिद्धार्थ द्विवेदी सुपुत्र पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी), जो पहले से मौजूद थे, ने मेरे हाथ में ग्लास थमा दिया.

एक फिल्मी ने संतोषानंद से पूछा, ‘गांधी की एक खूबी बता दो तो जानें.’ मैंने मजाक के लहजे में कहा कि दोस्त पहले लड़के से बतिया लो फिर बाप से पूछना. गांधी दुनिया का सबसे बड़ा पोस्टर डिजाइनर है. उससे बड़ा कोई आर्टिस्ट पैदा नहीं हुआ. यह चौंकानेवाला बयान था. एक चुप्पी तैर गयी. किसी ने कहा, हम समङो नहीं. मैंने चिढ़ाया, बहुत लोग अब तक गांधी को नहीं समझ पाये हैं.

तो सुनिये,‘गांधी ने आजादी की लड़ाई में चरखा खोज निकाला. उस जमाने में जो चरखा चलाता मिल जाता था, मान लिया जाता था कि यह कांग्रेसी है. और इस पर कोई प्रतिबंध भी नहीं लग सकता था, क्योंकि यह उत्पादन का जरिया भी था.’ इतने में पीछे से आवाज आयी,‘साहिब! मेरा नाम राजेश खन्ना है.’ कह कर वे आगे बढ़े, मैं भी उनकी तरफ बढ़ा. काका के साथ राजीव शुक्ला थे. उन्होंने हमारा परिचय दिया. यह थी काका से पहली मुलाकात, जो बापू के बहाने से शुरू हुई और आखिर तक बनी रही. उस दो अक्तूबर को काका ने नहीं पीया. यह सुलेख पूरे अक्तूबर को समर्पित है.

चंचल
सामाजिक कार्यकर्ता
samtaghar @gmail.com

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