यही तो सियासत का मिजाज है

Published at :16 Jun 2015 5:19 AM (IST)
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यही तो सियासत का मिजाज है

अखिलेश शर्मा वरिष्ठ पत्रकार राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता है, अगर होता तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बांहें फैला कर ओड़िशा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग का स्वागत नहीं करते. शाह से मुलाकात के साथ ही गमांग का भाजपा में आने का रास्ता साफ हो गया है. लेकिन गमांग के […]

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अखिलेश शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता है, अगर होता तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बांहें फैला कर ओड़िशा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग का स्वागत नहीं करते. शाह से मुलाकात के साथ ही गमांग का भाजपा में आने का रास्ता साफ हो गया है. लेकिन गमांग के बहाने 17 साल पुराने उस विश्वास प्रस्ताव पर मतदान की याद ताजा हो गयी, जो वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट से हार गयी थी.

बात है 17 अप्रैल, 1999 की. एआइएडीएमके के समर्थन वापस लेने के बाद वाजपेयी सरकार को विश्वास प्रस्ताव रखना पड़ा. लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही देर पहले बसपा नेता मायावती ने कहा कि उनकी पार्टी मतदान में हिस्सा नहीं लेगी. प्रमोद महाजन समेत सरकार के रणनीतिकारों ने राहत की सांस ली. सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सबकी नजरें विपक्षी बेंच पर गयी, जहां उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग बैठे मुस्कुरा रहे थे.

वो ठीक दो महीनों पहले यानी 18 फरवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे, मगर उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा नहीं दिया था.

जब मायावती के बोलने की बारी आयी, तो यू टर्न लेते हुए उन्होंने विश्वास मत के विरोध में वोट डालने का फैसला सुनाया और लोकसभा में हड़कंप मच गया. सरकार की स्थिति पहले ही नाजुक थी. प्रमोद महाजन आखिरी वक्त तक मोर्चा संभाले हुए थे.

मतदान हुआ.

गमांग ने सरकार के खिलाफ वोट दिया. तब नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद सैफुद्दीन सोज ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर सरकार के खिलाफ वोट दिया. थोड़ी देर बाद स्पीकर ने ऐलान किया कि विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 269 और विरोध में 270 वोट पड़े. तेरह महीने पुरानी वाजपेयी सरकार गिर चुकी थी. पूरा सदन खामोश हो गया. विपक्षी पार्टियों का उत्साह फूट पड़ा. शरद पवार उठ कर मायावती के पास गये और गर्मजोशी से उनका शुक्रिया अदा किया. कांग्रेसी सांसद गमांग और सैफुद्दीन सोज से लगातार हाथ मिला रहे थे. वाजपेयी ने हाथ सिर से लगा कर सलाम कर सदन का फैसला माना.

गमांग अब सफाई दे रहे हैं कि उनके वोट से वाजपेयी सरकार नहीं गिरी, बल्कि सोज के वोट से गिरी थी. उनका कहना है कि चीफ ह्विप ने उनसे मतदान करने को कहा था. उड़ीसा की राजनीति में गमांग एक बड़ा नाम है. वो कोरापुट सीट से 1972 से लगातार आठ बार सांसद रहे. इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिम्हा राव की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे और उड़ीसा के मुख्यमंत्री भी रहे.

भाजपा का कहना है कि 72 वर्षीय गमांग के रूप में एक बड़ा आदिवासी नेता मिला है. राज्य में नवीन पटनायक का जादू तोड़ने में कांग्रेस-भाजपा दोनों नाकाम रहे हैं. भाजपा का यही कहना है कि गमांग के आने से उसे अपनी ताकत बढ़ाने में मदद मिलेगी.

गमांग के एक वोट से वाजपेयी सरकार के गिरने के सवाल को भाजपा भी अब ज्यादा तूल नहीं देना चाहती है. भाजपा का भी अब कहना है इसके लिए सोज ही जिम्मेवार थे. यही सियासत का मिजाज है, जहां बनती-बिगड़ती, दोस्ती-दुश्मनी में पिछली बातों को भुला कर ही आगे बढ़ा जाता है.

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