कारवालों ने कर दी है जिंदगी बेकार

Published at :12 May 2015 12:28 AM (IST)
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कारवालों ने कर दी है जिंदगी बेकार

पंकज कुमार पाठक प्रभात खबर, रांची शहर के बीचो-बीच स्थित एक बाजार से गुजर रहा था. बाजार से सटी मुख्य सड़क पर दो लोगों में तीखी नोक-झोंक हो रही थी. कारण पता करने पर मालूम हुआ कि सड़क पर जबरदस्ती अपनी कार पार्क करने के चक्कर में दूसरे ने पहलेवाले की कार की पिछली दोनों […]

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पंकज कुमार पाठक
प्रभात खबर, रांची
शहर के बीचो-बीच स्थित एक बाजार से गुजर रहा था. बाजार से सटी मुख्य सड़क पर दो लोगों में तीखी नोक-झोंक हो रही थी. कारण पता करने पर मालूम हुआ कि सड़क पर जबरदस्ती अपनी कार पार्क करने के चक्कर में दूसरे ने पहलेवाले की कार की पिछली दोनों आंखें फोड़ दी. अब पीछे से ‘अंधी’ हो चुकी अपनी कार देख पहला, दूसरे को ‘गंदी-गंदी’ गाली देने लगा.
फिर धीरे-धीरे बात बिगड़ी. इस दृश्य को देख कर और भविष्य की कल्पना करते हुए एक व्यंग्यकार की कही पंक्ति याद आ गयी कि ‘पानी नहीं, पार्किग के लिए होगा तीसरा विश्वयुद्ध.’ यह समस्या इतनी बड़ी हो गयी है कि अब घरों के मुख्य दरवाजे पर मालिक की ‘नेम प्लेट’ नहीं, बल्कि ‘नो पार्किग’ का बोर्ड लगता है. मुझे यकीन है कि प्रधानमंत्री जी अगर कह दें कि पार्किग की समस्या से निजात पाने के लिए ‘भूमि अधिग्रहण बिल’ जरूरी है, तो न सिर्फ देश में इसका विरोध बंद होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर इसे सराहा भी जायेगा. क्योंकि आज चिंता का विषय सिर्फ बढ़ती जनसंख्या ही नहीं, बल्कि छोटी-बड़ी कारों की संख्या भी है.
एक जमाना था, जब कार से चलनेवालों को लोग सम्मान की नजर से देखते थे. अब पैदल चलनेवालों को देखते हैं. क्योंकि आज कार या मोटरसाइकिलों की भीड़ ने शहरों के बाजारों के साथ-साथ गली-कूचों की खूबसूरती बिगाड़ दी है. बाजार में जितनी दुकानें नहीं हैं, उससे अधिक तो वहां कारें खड़ी रहती है. मैं अक्सर कहता हूं कि आज महिलाएं जितनी तेजी से अपने लिए ‘साड़ियां’ नहीं खरीदतीं, उससे ज्यादा तेजी से आदमी ‘गाड़ियां’ खरीद रहा है.
इसे चल कर आइए, चला कर जाइए वाले विज्ञापनों का असर कहिए या सस्ती दरों पर मिलनेवाले ‘कार लोन’ का परिणाम (या शायद दुष्परिणाम), अब ज्यादातर मध्यमवर्गीय घरों में गैरेज बन गये हैं. उन्हें अब आधा किलो प्याज भी खरीदना होता है, तो कार से ही बाजार जाते हैं.
दरअसल, लोग स्वाभाविक जरूरत और जबरदस्ती पैदा की गयी जरूरत में फर्क नहीं समझते. वे नहीं जानते कि स्वाभाविक जरूरत के रास्ते पर चलने से समस्याएं खत्म होती हैं, पर जबरदस्ती की जरूरत से सिर्फ समस्याएं खड़ी होती हैं. जरूरत हो या न हो, लेकिन अपने पड़ोसियों से गैरजरूरी प्रतिस्पर्धा करने में हम ‘मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार’ जन्मजात माहिर हैं. इसी जबरदस्ती की प्रतिस्पर्धा के कारण एक-एक आदमी ने तीन-तीन कारें खरीद ली हैं.
वो तो अच्छा कि भगवान ने आदमियों को सिर्फ दो टांगें दी हैं. नहीं तो अगर चार-पांच टांगें होतीं, तो आज के जमाने में एक-एक आदमी तीन-तीन कार लेकर बाजार जाता. और तब पार्किग की समस्या सिर्फ समस्या नहीं रह जाती, बल्कि सचमुच विश्वयुद्ध की वजह बन जाती.
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