काम नहीं, जुमलों का रिपोर्ट कार्ड बने

Published at :05 May 2015 1:31 AM (IST)
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काम नहीं, जुमलों का रिपोर्ट कार्ड बने

विश्वत सेन प्रभात खबर, रांची आजकल हमारे देश में जुमला-जुमला खेला जा रहा है. देश चलाने वाले, जुमलों के सहारे देश चलाने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले साल देश में परिवर्तन की बयार बही थी और साथ में बह रही थी जुमलों की अविरल धारा. यही तो वह समय था जब देश के प्रधानमंत्री […]

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विश्वत सेन
प्रभात खबर, रांची
आजकल हमारे देश में जुमला-जुमला खेला जा रहा है. देश चलाने वाले, जुमलों के सहारे देश चलाने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले साल देश में परिवर्तन की बयार बही थी और साथ में बह रही थी जुमलों की अविरल धारा.
यही तो वह समय था जब देश के प्रधानमंत्री (हालांकि तब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे) और उनकी पार्टी के नेता जुमले गढ़ रहे थे. वो भी ऐसे-वैसे नहीं, बल्कि देश का भविष्य तय करनेवाले जुमले. पूरा एक साल होने को है, लेकिन आज तक सिवाय जुमलों के देशवासियों को और कुछ देखने को नहीं मिला है.
बीते एक साल से जुमलों से ही देश चलाने की कोशिश की जा रही है. मतदान के समय युवाओं को रोजगार दिलाने के जुमले गढ़े गये. युवाओं ने लोकतंत्र के महान पर्व में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अपार शक्ति प्रदान कर दी. जनता के खातों में विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर 15-15 लाख रुपये जमा कराने का जुमला गढ़ा गया. जनता ने सिर पर बिठाया.
किसानों को खुशहाल बनाने का जुमला बनाया गया, किसानों ने अपना दर्द भूल जम कर इवीएम का बटन दबाया. इसी प्रकार देश के हर वर्ग, जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के लोगों के लिए अलग-अलग तरीके से विभिन्न प्रकार के जुमले बनाये गये और हर वर्ग के लोगों से भरपूर लाभ लिया गया. ‘बीत गयी सो बात गयी, माना वह बेहद प्यारा था..!’ की तर्ज पर देश के नीति-निर्धारकों ने भारतवासियों से उन जुमलों को भूल जाने की गुजारिश की. सरकार गठन के सौ दिन बाद रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाने लगा, तो एक नया जुमला आया कि अभी तो ‘हनीमून पीरियड’ खत्म ही नहीं हुआ है.
लोग चुप हो गये. बिहार में जब लालू प्रसाद नये-नये मुख्यमंत्री बने थे, तो वे भी रोज नये-नये जुमले बनाते थे. उनका यह सिलसिला आज तक जारी है. उनकी देखादेखी अन्य राजनेता भी जुमला बनाने की कोशिश करने लगे, लेकिन गुरु तो गुरु ही होता है. लोगों के जुमले लालूजी के जैसे नहीं हुए. वैसे ही जैसे कविता तो प्राय: हर राजनेता करता है, लेकिन अटलजी की कविताओं के आगे उनकी कविता नहीं ठहरती. मोदीजी ने भी लालूजी की तरह जुमला बनाने का प्रयास किया. बनाया भी. उनके कुनबे के लोगों ने भी बनाया.
लालू का जुमला समय रहते तो भुला दिया जाता था, लेकिन इनके वाले भुलाये नहीं गये. आज देश में सत्ता परिवर्तन के एक साल होने को हैं, लेकिन कोई उसकी रिपोर्ट नहीं बना रहा है, क्योंकि जुमलों ने कुछ वर्गो को भक्त बना दिया और जो भक्त नहीं हैं वे जुमलों से इतर कुछ देखने को तैयार नहीं.
अब जरूरत है कि देश में सरकार के कामकाज की नहीं, बल्कि उन जुमलों का रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाये, जो एक साल से फेंके जा रहे हैं. उन जुमलों का हिसाब रखना तो बहुत जरूरी है, जिसके जरिये देश चलाने की कोशिश की जा रही है.
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