इसकी जड़ में कोई जाये भी तो क्यों!

Published at :30 Apr 2015 2:25 AM (IST)
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इसकी जड़ में कोई जाये भी तो क्यों!

राजेंद्र तिवारी कॉरपोरेट एडिटर प्रभात खबर फर्जी डिग्री के धंधे की जांच की मांग नहीं हो रही, क्योंकि इन राजनीतिकों की चिंता फर्जी डिग्री या शिक्षा के स्तर को लेकर नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने और कुछ प्वाइंट स्कोर कर लेने भर की है. मामला वोट और नोट से जुड़ा जो है! […]

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राजेंद्र तिवारी
कॉरपोरेट एडिटर
प्रभात खबर
फर्जी डिग्री के धंधे की जांच की मांग नहीं हो रही, क्योंकि इन राजनीतिकों की चिंता फर्जी डिग्री या शिक्षा के स्तर को लेकर नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने और कुछ प्वाइंट स्कोर कर लेने भर की है. मामला वोट और नोट से जुड़ा जो है!
दिल्ली सरकार के कानून मंत्री की डिग्री को लेकर विवाद चल रहा है. इससे पहले राहुल गांधी और स्मृति ईरानी की शैक्षिक योग्यता को लेकर भी हल्ला मच चुका है. बिहार में टीइटी (टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट) की हजारों फर्जी मार्क्‍सशीट्स का मामला अभी ताजा ही है.
अगर पीछे जाएं तो 1980 के दशक में (जब मैं विश्वविद्यालय का छात्र था) लखनऊ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में एनएसयूआइ के एक छात्र नेता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के हाथों गोल्ड मेडल प्राप्त किया और बाद में पता चला कि यह गोल्ड मेडल नकली मार्क्‍सशीट के आधार पर हासिल किया गया था. नब्बे के दशक में छात्रसंघ के एक निर्वाचित अध्यक्ष को इसलिए अपने पद से हाथ धोना पड़ा कि उसने अपने नामांकन पत्र में जो डिग्री दिखायी थी, वह फर्जी थी.
ये लोग तो विरोधियों की सक्रियता की वजह से पकड़े गये, लेकिन उनका क्या जो पब्लिक लाइफ में नहीं हैं. कल फेसबुक पर एक पोस्ट देखी पेरी महेश्वर की वाल पर, तो मुङो कई वाकये याद आ गये. पेरी की पोस्ट में कहा गया है कि सांसद और विधायक फर्जी डिग्रियों के लिए और मामले का पर्दाफाश होने पर भी बच कर निकल लेने के लिए जाने जाते हैं. मानद डाक्टरेट्स, मास्टर्स डिग्रियां वोटरों को मूर्ख बनाने के लिए हासिल की जाती हैं. पेरी ने अपनी पोस्ट में एक सांसद का उदाहरण दिया है.
पोस्ट में कहा गया है कि लोकसभा के रिकार्ड में यह सांसद आइआइपीएम से बीबीए और एमबीए है. पेरी ने अपनी पोस्ट में दावा किया है कि यदि उनका फर्जीवाड़ा हटा दिया जाये, तो वह मात्र 12वीं पास हैं. आम आदमी पार्टी के नेता भी अब ये ट्रिक्स सीख रहे हैं.
एक और वाकया-हमारे साथ बीएससी में एक लड़का था अखिल (बदला हुआ नाम). उसके पिता एक सरकारी विभाग में इंजीनियर थे और माता जी स्कूल की प्रिंसिपल. पैसा बहुत था. उसका एक दोस्त विश्वविद्यालय प्रोफेसर का रिश्तेदार था. प्रोफेसर साहब छात्र नेताओं के प्रिय थे. अखिल कोई क्लास अटेंड नहीं करता.
कैंटीन में बैठ कर सिगरेट पीने और लड़कियों को देखने और उन पर फब्ती कसने में ही उसका पूरा दिन निकल जाता था.
परीक्षा हुई. अखिल फेल हो गया, लेकिन उसको दुख इसका नहीं था कि वह फेल हो गया, उसको चिंता थी कि पिता जी को कैसे फेस करूंगा. पाकेट मनी बंद हो जायेगी और ऊपर से मार पड़ेगी अलग से.
लेकिन दो दिन में उसने रास्ता खोज लिया. कोरी मार्क्‍सशीट बुक उसके हाथ में थी, रजिस्ट्रार की मुहर लगी हुई. तब हाथ से मार्क्‍सशीट भरी जातीं थीं और उन पर रजिस्ट्रार के दस्तखत होते थे. दिक्कत थी रजिस्ट्रार के दस्तखत की कापी करने की. पूरे दिन प्रैक्टिस की और शाम को फ्लो आ गया. इस तरह प्रथम श्रेणी के नंबर की मार्क्‍सशीट तैयार हो गयी. अखिल ने दोनों साल फर्जीवाड़ा किया.
इसके बाद उसने एमएससी (मैथ्स) की मार्क्‍सशीट बनायी. दूरदराज के इंस्टीट्यूट्स की प्रवेश परीक्षाओं के लिए भी वह आवेदन करता था. प्रवेशपत्र आने पर अपने पिताजी से आने-जाने-रहने-खाने का मोटा खर्चा-पानी लेकर हॉस्टल में हफ्तेभर के लिए डेरा जमा लेता था और दोस्तों के साथ मजे करता था. हमलोग पूछते थे कि कहीं पकड़ लिये गये तो क्या होगा, कभी सोचा है? वह कहता कि पकड़े तो तब जायेंगे जब मैं कोई परीक्षा देने जाऊं, उसे पास भी कर जाऊं और फिर प्रवेश लेने भी पहुंच जाऊं. उसका लॉजिक तो सही था.
वह कभी कोई प्रवेश परीक्षा देने गया ही नहीं और न कभी पकड़ा गया. पता चला कि रजिस्ट्रार ऑफिस के बाबुओं से उसकी अच्छी जान-पहचान हो गयी थी और रिकार्ड रूम हमेशा उसकी पहुंच में था. बाद में अखिल बाबू ने अपनी इन्हीं मार्क्‍सशीटों के आधार पर लोन लेकर बिजनेस शुरू कर दिया.
एक किस्सा और. विश्वविद्यालय के एक दबंग जुगाड़ू प्रोफेसर के भतीजे ने चमड़े का कारखाना लगाने का प्लान बनाया. उसके लिए लोन लेना था, लेकिन लोन के लिए शर्त प्रार्थी के पास लेदर टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा होने की थी. दक्षिण भारत के किसी संस्थान में उसने एडमिशन लिया. मोटे पैसे लेकर परीक्षा देने कोई और जाता था. और इस तरह उसने डिप्लोमा हासिल कर लिया और उसके बाद लोन भी. ऐसे और भी तमाम किस्से हैं. आपकी जानकारी में भी होंगे. लेकिन ये सब बाते हैं 20 साल पहले की. अब तो स्थितियां बदल गयीं हैं.
अब छात्र पेपर खराब हो जाने पर ही हो हल्ला मचाने लगते हैं कि इसमें सबको पास करो और शिक्षा प्रशासन पर बंद, तोड़फोड़ व धरना-प्रदर्शन आदि के जरिये दबाव बनाया जाता है. यदि प्रशासन अड़ जाये तो उस वाइस चांसलर या प्राचार्य को ही राजनीतिक दबाव डलवा कर हटवा दिया जाता है. उत्तर भारत के तमाम विश्वविद्यालयों में यही चल रहा है. जो यह सब कराते हैं, वे ही राजनीतिक नेतृत्व में आते हैं.
उत्तर प्रदेश और बिहार के विश्वविद्यालयों पर नजर डालिये, कहीं कोई ऐसा वाकया आपको दिखा कि जहां बेहतर पढ़ाई और कड़ाई से परीक्षा की मांग छात्र नेताओं या राजनीतिक नेतृत्व ने की हो.
पिछले हफ्ते मैं भागलपुर में था. वहां के तिलका मांझी विश्वविद्यालय में परीक्षाएं चल रही थीं. गणित की परीक्षा में प्रश्न कड़े आ गये तो धरना-प्रदर्शन-तोड़फोड़ से लेकर वाइस चांसलर को बंधक बनाने तक के सद्कर्म वहां किये गये और यह दबाव बनाया गया कि परीक्षा फिर से करायी जाये. चर्चा यह भी है कि एक प्राचार्य, जो थोड़े कड़क थे, उनको हटवाने के लिए राजनीतिक कसरत शुरू हो गयी है.
मुङो याद है कि 1991 में उत्तर प्रदेश में तत्कालीन शिक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने नकल रोकने के लिए कड़ा कानून लागू किया. उनके खिलाफ पूरा माहौल बन गया. विपक्षी दलों ने इश्यू बना दिया.
चुनाव हुए तो राजनाथ सिंह लखनऊ के एक विधानसभा क्षेत्र में एक अदने से कॉरपोरेटर से चुनाव हार गये. नयी सरकार ने आते ही कानून खत्म कर दिया और आज तक किसी ने नकल रोकने के लिए कानून बनाने की हिम्मत नहीं की. हमारे समाज में इन सबको लेकर कहीं कोई खदबदाहट है ही नहीं और न ही राजनीति में.
आप खुद ही सोचिये कि दिल्ली के कानून मंत्री की डिग्री को लेकर जितने भी राजनीतिक बयान आये हैं या प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें कोशिश सिर्फ ‘आप’ को घेरने भर की है. कोई यह मांग नहीं कर रहा कि फर्जी डिग्री के धंधे की जांच हो और इस धंधे में शामिल लोगों पर कार्रवाई हो. क्यों?
क्योंकि इन राजनीतिकों की चिंता फर्जी डिग्री या शिक्षा के स्तर को लेकर नहीं, बल्कि राजनीतिक विरोधी को नीचा दिखाने और कुछ प्वाइंट स्कोर कर लेने भर की है. जड़ में कोई जाये भी तो क्यों, वोटों और नोटों का मामला जो है!
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