इन बच्चों को तुरंत रिहा कराया जाये

Published at :24 Apr 2015 5:29 AM (IST)
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इन बच्चों को तुरंत रिहा कराया जाये

गुमला जिले के विशुनपुर से माओवादियों का दस्ता 35 बच्चों को उठा ले गया. पहले भी ऐसी खबरें आती रही हैं कि नक्सलियों ने बाल दस्ता बनाया है. तसवीरें भी आती रही हैं, लेकिन पुलिस इन बच्चों को नक्सलियों को मुक्त नहीं करा पाती. इतनी बड़ी संख्या में बच्चे उठा लिये गये, पर ग्रामीण कुछ […]

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गुमला जिले के विशुनपुर से माओवादियों का दस्ता 35 बच्चों को उठा ले गया. पहले भी ऐसी खबरें आती रही हैं कि नक्सलियों ने बाल दस्ता बनाया है. तसवीरें भी आती रही हैं, लेकिन पुलिस इन बच्चों को नक्सलियों को मुक्त नहीं करा पाती.

इतनी बड़ी संख्या में बच्चे उठा लिये गये, पर ग्रामीण कुछ बोल नहीं पा रहे हैं. बच्चों के मां-बाप भी चुप हैं. भयभीत हैं. उन्हें डर है कि पुलिस के हरकत में आने पर नक्सली उन्हें या उनके बच्चों को मार न दें.

इन बच्चों में 10-14 साल की लड़कियां भी हैं. यह भी खबर है कि नक्सली इन बच्चों को बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं. हाल के दिनों में माओवादियों के दस्तों में कैडर की कमी हुई है. उन्हें कैडर नहीं मिल रहे. एक समय था जब व्यवस्था से नाराज होकर युवक खुद माओवादियों के दस्ते में शामिल होते थे. वे शोषणमुक्त समाज की कल्पना लिये दस्ते में जाते थे.

पैसे का बहुत लोभ नहीं होता था. विचारों का आकर्षण था. अब समय बदल गया है. अनेक उग्रवादी संगठन बन गये हैं. इनमें से कुछ को पुलिस का भी समर्थन मिलता है. ऐसे संगठनों में कोई मूल्यबोध नहीं है. लगभग सभी उग्रवादी संगठन भारी लेवी वसूल रहे हैं. भाकपा (माओवादी) में आज भी ऊपर से नियंत्रण है, इसलिए यहां ज्यादा छूट नहीं है.

अन्य संगठनों में आजादी है और वे भारी लेवी वसूलते हैं. भाकपा (माओवादी) से भी कुछ कैडर ऐसे संगठनों में जा रहे हैं, ताकि लेवी वसूलने की आजादी रहे. ऐसी स्थिति में कैडर की कमी हो रही है. इसी की भरपाई करने के बच्चों को एक रणनीति के तहत दस्ते में शामिल किया जा रहा है. ताकि इन्हें अपने विचार के अनुरूप ढाला जा सकेऔर इनके भटकने की आशंका नहीं के बराबर रहे. इसलिए हर गांव से बच्चों को मांगा जा रहा है.

गांव के लोग क्या करें? अगर बच्चे नहीं दें, तो नक्सली उन्हें नहीं छोड़ेंगे. इसलिए कई परिवार चुपचाप पलायन कर रहे हैं. पुलिस व प्रशासन को इसकी जानकारी है, लेकिन वे लिखित आवेदन का इंतजार कर रहे हैं. जो ग्रामीण भयभीत है, जिसका बच्च दस्ते में फंसा हुआ है, उससे आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह नक्सलियों के विरोध में खड़ा होगा. यह सरकार की जिम्मेवारी है और इस मामले में पुलिस प्रशासन अब तक फेल साबित हुआ है.

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