पहले खुद के अंत: करण को शुद्ध करें
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Apr 2015 2:03 AM (IST)
विज्ञापन

क्या झारखंडियों के हित में स्थानीय नीति नहीं बननी चाहिए? 14 सालों से इस नीति पर ड्रामा होता रहा. राज्य के पहले मुख्यमंत्री ने जो तर्क दिया था, वह सही था, लेकिन सत्ता के लोभ में स्थानीय नेता स्पष्टवादी बनने से बच रहे हैं. अभी नये मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि स्थानीय नीति दो […]
विज्ञापन
क्या झारखंडियों के हित में स्थानीय नीति नहीं बननी चाहिए? 14 सालों से इस नीति पर ड्रामा होता रहा. राज्य के पहले मुख्यमंत्री ने जो तर्क दिया था, वह सही था, लेकिन सत्ता के लोभ में स्थानीय नेता स्पष्टवादी बनने से बच रहे हैं. अभी नये मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि स्थानीय नीति दो महीने में बना दूंगा. क्या मुख्यमंत्री राज्य के लोगों के हितैषी बन सकेंगे?
अभी तक यहां के लोगों का विकास नहीं हो पाया है. फिर मैथिली, मगही, भोजपुरी को दूसरी राजभाषा बनाने के लिए व्याकुल क्यों हैं? क्या बिहार में झारखंड की स्थानीय भाषाओं को स्थान मिला है? यदि हां, तो यहां भी मिलना चाहिए, लेकिन यदि नहीं, तो फिर ऐसा प्रयास क्यों? कहीं ऐसा न हो दामोदर की भाषा पीछे और गंगा की भाषा आगे चली जाये. इसलिए स्थानीय नीति बनाने से पहले अंत:करण शुद्ध करना जरूरी है.
अर्जुन पानुरी, धनबाद
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




