आंधी, गांधी और यूटोपियाई सपना

Published at :21 Apr 2015 6:12 AM (IST)
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आंधी, गांधी और यूटोपियाई सपना

विश्वत सेन प्रभात खबर, रांची यूटोपिया. यह एक ऐसा काल्पनिक लोक है, जहां रामराज है. भला हो थॉमस मूर का कि जिन्होंने दुनिया को सपनों में जीने का एक जरिया दे दिया. भारत भी इससे अछूता नहीं है. भारत के राजनेता यूटोपियाई सपने दिखाते हैं, तो भारतीय उसमें जीते हैं. गांधीजी तो अपने सपनों के […]

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विश्वत सेन
प्रभात खबर, रांची
यूटोपिया. यह एक ऐसा काल्पनिक लोक है, जहां रामराज है. भला हो थॉमस मूर का कि जिन्होंने दुनिया को सपनों में जीने का एक जरिया दे दिया. भारत भी इससे अछूता नहीं है.
भारत के राजनेता यूटोपियाई सपने दिखाते हैं, तो भारतीय उसमें जीते हैं. गांधीजी तो अपने सपनों के साथ ही इस दुनिया से कूच कर गये, लेकिन उनके तथाकथित अनुयायी (सच्चा अनुयायी तो चिराग लेकर खोजने से भी शायद ही मिले) दिन-रात उनके सपने को साकार करने की सौगंध खाते नहीं थकते हैं.
दिलचस्प बात तो यह है कि अब देश में कोई, गांधी का विरोधी नहीं बचा है. जिस विचारधारा के लोगों पर गांधीजी के कत्ल का इल्जाम है, वे भी गांधी-गांधी की माला फेर रहे हैं. मगर नतीजा उल्टा हो रहा है. आज आजादी के दशकों बाद भी गांधीजी का रामराज का सपना हमारे लिया यूटोपिया ही बना हुआ है.
एक आंधी यहां के किसानों-मजदूरों का सपना उड़ा ले जाने के लिए काफी है. बहुत उम्मीद से बेचारा किसान फसल बोता है, मगर कभी ज्यादा बारिश, तो कभी कम बारिश से फसलें बर्बाद हो जाती हैं. हुदहुद, फैलिन और अल नीनो जैसे नये-नये राक्षस किसानों के सपने निगल जाने के लिए पैदा हो गये हैं.
अगर आंधी से किसी का सपना बच भी जाये, तो गांधीजी खुद उसके सपनों को तोड़ देते हैं. जी हां, हम बात कर रहे हैं गांधी छाप हरे, पीले और लाल नोटों की. एक धनपशु आता है, अफसर के मुंह पर गांधी छाप की गड्डी दे मारता है, और स्वप्नजीवी गरीब आदमी का हक ले उड़ता है.
यह हक बैंक से मिलनेवाला कर्ज भी हो सकता है और कोई सरकारी नौकरी भी. नौकरशाह और राजनेता जानते हैं कि गरीबों की ओर ध्यान देने से उनका उल्लू सीधा नहीं होगा इसलिए उनका झुकाव भी उन्हीं की ओर होता है जिनके पास गांधी छाप नोट होते हैं. भ्रष्टाचार से दूर रहनेवाले बेचारे गांधीजी जरिया बने हुए हैं भ्रष्टाचार का. गांधीजी का बस चलता, तो वह निकल भागते इन करेंसी नोटों से, जो उनका सम्मान की जगह अपमान कर रहे हैं.
आंधी, गांधी से अगर किसी ने पार पा भी लिया, तो एक जाल ऐसा है जिसमें वह जरूर फंसता है. वह है, यूटोपियाई सपने का जाल. चंद महीनों पहले एक नेता ने ऐसे सपने दिखाये कि जनता उसकी बांसुरी की धुन पर चूहे की तरह पीछे-पीछे हो ली. उसने जो सपने दिखाये, वो दूसरे नेताओं के सपनों से कहीं ज्यादा आकर्षक थे. नतीजा यह हुआ कि वह नेता आज प्रधानमंत्री है.
बदकिस्मती यह है कि जनता हर बार न फंसने की कसम खाती है, पर अंतत: किसी न किसी के यूटोपियाई सपनों में फंस ही जाती है. सभी राजनीतिक दलों का लक्ष्य एक ही है. 60 फीसदी जनता को यूटोपियन सपनों में फंसा कर मूर्ख बनाओ, 40 फीसदी को लॉलीपॉप दो और बाकी का लाभ खुद गटक जाओ.
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