समस्या के मुताबिक समाधान

Published at :20 Apr 2015 6:07 AM (IST)
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समस्या के मुताबिक समाधान

अच्छी खबर है कि इस पुरानी राजनीति को 21वीं सदी के युवाओं के रूप में एक नया शत्रु मिल गया है, जिन्हें उस चीज की पहचान है, जो उनके माता-पिता को उपलब्ध नहीं थी या उनसे छुपी हुई थी : एक समान, साङो और गतिशील भारत में आर्थिक समृद्धि की संभावना. अनुभव से बहुत कुछ […]

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अच्छी खबर है कि इस पुरानी राजनीति को 21वीं सदी के युवाओं के रूप में एक नया शत्रु मिल गया है, जिन्हें उस चीज की पहचान है, जो उनके माता-पिता को उपलब्ध नहीं थी या उनसे छुपी हुई थी : एक समान, साङो और गतिशील भारत में आर्थिक समृद्धि की संभावना.

अनुभव से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. इस संदर्भ में मुङो याद आता है वह दिन, जब मैं एक प्रतिनिधिमंडल के साथ एक दबंग क्षत्रप से मिलने गया था. हमारी बैठक का एकमात्र एजेंडा अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलिम लड़कियों, की शिक्षा की पहुंच, गुणवत्ता और गंभीरता पर चर्चा करना था. इस उचित उद्देश्य ने कई योग्य घटकों को एक मंच पर लाया था, जिसमें संपादक, शिक्षाविद्, स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रमुख और सामाजिक कार्य करनेवाले लोग शामिल थे. हम उक्त क्षत्रप के कार्यालय से सटे एक कमरे में अपने चेहरों पर संतत्व की मुस्कान लिये बैठे हुए थे. अनिवार्य प्रतीक्षा के बाद हम पंक्तिबद्ध होकर उनके कक्ष में दाखिल हुए.

सम्मानित नेता की मौजूदगी में हमारी मुस्कान गायब हो गयी. किसी ने धीमे स्वर में कुछ कहा. एक पत्र हाजिर किया गया. उस महान व्यक्ति ने ऐसी गंभीरता से उसे पढ़ा, मानो हमारी सामूहिक बौद्धिकता उनकी वैचारिकता पर स्थायी असर छोड़ रही हो. उन्होंने सहमति में अपना सिर हिलाया. तभी अजीब गहमागहमी शुरू हो गयी. प्रतिनिधियों ने खुशामद की हर हद को पार करते हुए, जिसने मेरे अंदर के संशयी तंत्रिकाओं को भी हिला कर रख दिया, अपने लिए कुछ-कुछ मांगना शुरू कर दिया. एक छोटे अखबार के मालिक-संपादक अधिक विज्ञापन चाहते थे. कोई किसी संस्थान के शीर्ष पद पर काबिज होना चाहता था. जिस लगन और भावना से उन लोगों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थो की पैरवी की, वह वाणिज्य की किताब में एक अध्याय के रूप में शामिल होने लायक था. मुङो बाद में पता चला कि इनमें से कुछ निवेदन स्वीकार भी किये गये थे.

रही बात समुदाय की शिक्षा की, तो उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ. हम इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि अगर कुछ अच्छा नहीं हुआ, तो बुरा भी नहीं हुआ. इसलिए, यह जानना दिलचस्प है कि करीब एक सप्ताह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने गये मुसलिम धार्मिक नेताओं ने पारंपरिक मसलों से बिल्कुल अलग एक मुद्दे पर चर्चा की. उन्होंने एक ऐसी सच्चाई पर बात की, जो काफी समय से आकार ले रही थी, पर पिछले कुछ समय से इसकी गति तेज हुई है. यह सच्चाई है भारतीय मुसलिमों के जीवन में बड़े धन से पोषित वहाबी आंदोलन का बढ़ता प्रभाव और उसका उनके सांकेतिक संस्थाओं में बढ़ता नियंत्रण.

भारत के धार्मिक सद्भाव की शानदार खासियत उसके वे सिद्धांत हैं, जो धर्मो जितने ही पुराने हैं- सर्व धर्म समभाव का सनातन विचार और कुरान की वह सूक्ति, जिसमें कहा गया है कि तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए, मेरा धर्म मेरे लिए. स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और मौलाना आजाद जैसे धार्मिक और सामुदायिक नेताओं का स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान आजाद और आधुनिक भारत के लिए यही संदेश था. इन महापुरुषों के लिए सशक्त और एकताबद्ध भारत किसी निहित स्वार्थ से बहुत अधिक महत्वपूर्ण था.

ब्रिटिश शासन को यह पता था कि उनका राज एकताबद्ध भारत के आगे टिक नहीं पायेगा, इसलिए उसने पाकिस्तान की अवधारणा सामने आने से पहले से ही हर धर्म से जुड़े ऐसे संगठनों को बढ़ावा दिया, जो सद्भाव की जगह विभाजन की राजनीति कर रहे थे. लेकिन आम तौर पर भारतीय जन-समूह हिंसात्मक घटनाओं और दबाव के बावजूद सह-अस्तित्व के प्रति समर्पित रहा. परंतु सामाजिक बंटवारे के समर्थकों ने हार नहीं मानी है और माकूल मौके का इंतजार करते रहे हैं. यह भारत के हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों के लिए प्राथमिक चिंता है.

नीतिगत विमर्श में ‘सामाजिक-आर्थिक’ शब्द-युग्म का प्रयोग आम चलन है. भारतीय उपमहाद्वीप में यह कुछ अधिक ही प्रचलित है, क्योंकि लोगों को शैक्षणिक वंचना, विषमता, तिरस्कार और भयावह गरीबी के चंगुल में फंसाये रखने में सांस्कृतिक और धार्मिक कारकों ने काफी योगदान दिया है. समस्या जड़ में है, उसका समाधान भी वहीं खोजा जाना चाहिए. आजादी के करीब सात दशक गुजर गये हैं और अल्पसंख्यकों की समस्याओं के प्रबंधन की जिम्मेवारी बिचौलियों को दी जाती रही है जिन्होंने समुदाय की कीमत पर खुद को संपत्तिवान बनाया है. पूरे राजनीतिक क्षितिज पर उनके नाम लिखे हुए हैं. इन स्वार्थी नेताओं की बंटवारे के हिमायती लोगों से खूब छनती है, क्योंकि उनके धंधे को बंधुआ नियंत्रण के माहौल में ही ग्राहक मिलते हैं.

अच्छी खबर है कि इस पुरानी राजनीति को 21वीं सदी के युवाओं के रूप में एक नया शत्रु मिल गया है जिन्हें उस चीज की पहचान है, जो उनके माता-पिता को उपलब्ध नहीं थी या उनसे छुपी हुई थी : एक समान, साङो और गतिशील भारत में आर्थिक समृद्धि की संभावना. युवाओं को रोजगारपरक बढ़ती अर्थव्यवस्था में उम्मीद, शिक्षा और अवसर दीजिये, ताकि भारत उस भाग्य को प्राप्त कर सके जिसका वादा था.

एमजे अकबर

प्रवक्ता, भाजपा

delhi@prabhatkhabar.in

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