आलोचना और अभद्रता का अंतर

Published at :18 Apr 2015 5:35 AM (IST)
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आलोचना और अभद्रता का अंतर

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर होनेवाली बहसें किसी समाज की सहिष्णुता को परखने का एक सूत्र होने के साथ उसकी चेतना के विस्तार का मानदंड भी हो सकती हैं. लोकतांत्रिक अधिकार व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वतंत्रता के आधार होते हैं, पर उनके साथ उत्तरदायित्व के बोध की शर्त और सीमा भी होती है. सर्वोच्च न्यायालय […]

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर होनेवाली बहसें किसी समाज की सहिष्णुता को परखने का एक सूत्र होने के साथ उसकी चेतना के विस्तार का मानदंड भी हो सकती हैं. लोकतांत्रिक अधिकार व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वतंत्रता के आधार होते हैं, पर उनके साथ उत्तरदायित्व के बोध की शर्त और सीमा भी होती है.
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर इस बात को रेखांकित करते हुए कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अभद्रता का कोई स्थान नहीं है. एक प्रचलित कथन है कि आपकी स्वतंत्रता की हद वहां समाप्त होती है, जहां से मेरी नाक शुरू होती है. दरअसल यह सीमाएं ही वह परिवेश निर्मित करती हैं, जहां हम समुचित रूप से अपने अधिकारों का उपभोग करते हैं, और दूसरों के उन्हीं अधिकारों के प्रति अपने निर्दिष्ट कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं.
अधिकार और कर्तव्य के इसी संतुलन का उल्लंघन और अवमूल्यन अन्याय और अपराध के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होते हैं. ये नकारात्मक प्रवृत्तियां जब ऐतिहासिक महापुरुषों की अवमानना करने लगती हैं, तो यह गंभीर चिंता का कारण बनती हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट कहा है कि हमें राष्ट्रनिर्माताओं की आलोचना, उन पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी और उनकी हास्य-मिश्रित नकल करने जैसे अधिकार संविधान-प्रदत्त हैं, लेकिन अभिव्यक्ति या कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर भाषा व व्यवहार की अभद्रता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
मौजूदा मामला एक कविता में महात्मा गांधी द्वारा अपशब्द बोलने से जुड़ा हुआ है. न्यायालय ने कहा है कि गांधी या अन्य महापुरुष कोई काल्पनिक चरित्र नहीं हैं, जिनके साथ ऐसी अभद्रताएं जोड़ी जाएं. मीडिया व डिजिटल माध्यमों की व्यापकता बढ़ने के कारण लोगों के नागरिक अधिकारों का विस्तार हुआ है, लेकिन महापुरुषों और गणमान्य व्यक्तियों के बारे में अनुचित तथा असभ्य बातें करने के मामले भी बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं.
ऐसी हरकतों को नियंत्रित करना सिर्फ सरकार या न्यायालय की जिम्मेवारी नहीं है, सचेत नागरिक और सजग समाज के रूप में हमें भी ऐसी प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करना चाहिए. रचनात्मक समाज विचारों के आदान-प्रदान और स्वस्थ आलोचना से बन सकता है, अभद्र नकारात्मकता से कतई नहीं.
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