पूर्ण और प्राकृत बनने की शिक्षा

Published at :16 Apr 2015 1:48 AM (IST)
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पूर्ण और प्राकृत बनने की शिक्षा

विश्वत सेन प्रभात खबर, रांची हमरे आदित गुरुजी. आदित माने आदित्य सिंह जी. घर के सामनेवाले मिडिल स्कूल में गणित से लेकर तमाम विषय पढ़ाते थे. हम भी उसी स्कूल के छात्र थे. गणित, अंगरेजी और विज्ञान में शुरू से ही अरुचि रही. थक-हार कर मैंने ऊपरी कक्षाओं में इनसे पीछा छुड़ा लिया. आज जब […]

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विश्वत सेन

प्रभात खबर, रांची

हमरे आदित गुरुजी. आदित माने आदित्य सिंह जी. घर के सामनेवाले मिडिल स्कूल में गणित से लेकर तमाम विषय पढ़ाते थे. हम भी उसी स्कूल के छात्र थे. गणित, अंगरेजी और विज्ञान में शुरू से ही अरुचि रही. थक-हार कर मैंने ऊपरी कक्षाओं में इनसे पीछा छुड़ा लिया.

आज जब हमारे बच्चे प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई कर रहे हैं, तो आदित गुरुजी का बताया ज्ञान बोतल के जिन्न की तरह बाहर आ रहा है. हमने चौथी-पांचवीं कक्षा में संख्या के मूलत: दो भेद पढ़े थे- प्राकृत संख्या और पूर्ण संख्या. बचपन में बाबूजी और आदित गुरुजी ठोक-ठेठा कर सिखाते रहे, तो नहीं सीखे. आज हम वही अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं. बच्चों की गणित की किताबों में मैं दो साल से लगातार प्राकृत और पूर्ण संख्याओं को खोज रहा हूं.

प्रथम सुपुत्र चौथी में गये, तो सोचा कि गणित में शायद मेरी वाली संख्या मिल जाये, पर नहीं मिली. अब पांचवीं में गये, तो इंतजार किया कि शायद अब मिल जाये, लेकिन सत्यानाश हो शिक्षा के नीति-निर्धारकों का कि उन्होंने गणित से प्राकृत और पूर्ण संख्या ही गायब कर दी. अंतत: मुङो गुरु ज्ञान का पिटारा खोलना पड़ा और बेटे को उसके पाठ्यक्रम से इतर प्राकृत और पूर्ण संख्या के बारे में बताया. हमारे राजनेता और शिक्षाविद् यह कहते नहीं थकते कि आजकल के विद्यार्थी गणित और विज्ञान पढ़ना नहीं चाहते.

भाई साहब, कोई हमें यह बतायेगा कि आखिर कोई छात्र विज्ञान और गणित की पढ़ाई क्यों नहीं करता? कैसे करेगा, जब आप उसे जड़ की बजाय सीधे फुनगी का ज्ञान देना शुरू कर देंगे? गुरुजी के जरा-सा लपड़ियाने पर जब गुरुजी को ही ठोंकना शुरू कर देंगे? हम खुद को दोयम दज्रे छात्र मानते हैं, पर हर स्थिति का सामना करने का पाठ अच्छे से सीखा है.

क्योंकि हमारे आदित गुरुजी ने कक्षा में सबसे पीछे बैठनेवाले हम लोगों को पूर्ण और प्राकृत रहने का गुर सिखाया था. प्राकृत और पूर्ण बनाने के दौरान जितनी ठुकाई गुरुजी ने की, वो आज तक सिहरन पैदा करती है. कबीर दास के शब्दों में कहें तो घड़े को ठोंकनेवाले खांटी कुम्हार की तरह गढ़ा है. इसलिए हम आड़े-तिरछे होकर भी ठोस हैं.

आज न तो स्कूलों में ठुकाई होती है और न कोई उसे सहता है. अगर अगर कभी ठुकाई होती भी है, तो गढ़ने के लिए नहीं, बल्कि बदले की भावना से हिंसा की जाती है. आजकल के पिलपिलाहे बच्चे थप्पड़ पड़ते ही होश खो देते हैं और अभिभावक, राजनेता, नीति-निर्धारक और सरकार चलानेवाले लोग शिक्षक पर पिल पड़ते हैं.

वह इसलिए क्योंकि उन्हें इस देश में अप्राकृत और अपूर्ण लोगों की फौज तैयार करके अपने स्वार्थ की रोटी सेंकनी है. एक को सत्ता, तो दूसरे को उच्च पद पर बने रहना है. आज हमें गर्व है आदित गुरुजी पर कि उन्होंने गणितज्ञ तो नहीं, मगर पूर्ण और प्राकृत जरूर बनाया.

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