आदिवासी समाज से सीखें दहेजलोभी

Published at :26 Mar 2015 2:24 AM (IST)
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आदिवासी समाज से सीखें दहेजलोभी

समाज के कुछ वर्गो को छोड़ दें, तो देश के सभी तबकों में दहेज जैसी कुप्रथा धड़ल्ले से अपनी पैठ बना चुकी है. समाज में ढेरों लोभी आज भी दहेज के पीछे भागते मिल जायेंगे. ‘जैसी योग्यता, वैसा दान-दहेज’ की मानसिकता भारतीय समाज को अंततोगत्वा तोड़ने वाली है. विडंबना यह है कि समाज के पढ़े-लिखे, […]

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समाज के कुछ वर्गो को छोड़ दें, तो देश के सभी तबकों में दहेज जैसी कुप्रथा धड़ल्ले से अपनी पैठ बना चुकी है. समाज में ढेरों लोभी आज भी दहेज के पीछे भागते मिल जायेंगे. ‘जैसी योग्यता, वैसा दान-दहेज’ की मानसिकता भारतीय समाज को अंततोगत्वा तोड़ने वाली है.
विडंबना यह है कि समाज के पढ़े-लिखे, अमीर व प्रतिष्ठित लोग भी इस अनैतिकता के सागर में डुबकी लगा रहे हैं. विवाह एक पवित्र बंधन है. इसे आप पैसे से कैसे तोल सकते हैं? आपसी विश्वास और प्यार ही तो इसकी असल पूंजी है. फिर बीच में पैसा क्यों आ रहा है?
पैसा तो परिवार एवं रिश्ते को तोड़ता है. तभी तो आज भारतीय समाज में तलाक का बाजार गर्म है. गरीब से गरीब पिता भी अपनी बेटी को अच्छे लड़के का ही जीवनसाथी बनाना चाहता है. लेकिन लड़कों एवं संबंधित परिवार की मांग पर खुद को असहाय महसूस करता है. हे राजकुमार! उस माता-पिता की मनोदशा पर भी तनिक विचार करो, जो अपनी बच्ची को तुम्हारे हाथों सौंप कर परंपरागत फर्ज निभा रहा है.
क्यों तुम पढ़-लिख कर भी इस अनैतिकता का साथ दे रहे हो? फिर क्या रह जायेगा शिक्षा का उद्देश्य? आम तौर पर आदिवासियों को हम निरक्षर मानते हैं, लेकिन एक बात जो खास है, वह यह कि आदिवासी समाज में विवाह से पूर्व लड़की का परिवार दहेज नहीं देता, बल्कि लड़कों का परिवार यथासंभव लड़कियों को कुछ वस्तुएं भेंट करते हैं.
है तो यह भी एक तरह का दहेज ही लेकिन यहां लड़के की सामाजिक हैसियत का प्रदर्शन कम और लड़की तथा उसके माता-पिता का सम्मान ज्यादा है. इससे लड़की के माता-पिता की नजरों में लड़के का व्यक्तित्व कई गुणा बढ़ भी जाता है. क्यों न ऐसी ही परंपरा का अनुसरण करें हम सभी!
सुधीर कुमार, गोड्डा
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