कश्मीर में ‘घोड़े और घास की यारी’

Published at :04 Mar 2015 6:47 AM (IST)
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कश्मीर में ‘घोड़े और घास की यारी’

राजनीति के हिस्से दुनिया का सबसे मुश्किल काम है विपरीत हितों के बीच सामंजस्य बैठाना, वह भी लोकतांत्रिक तरीके से. इस लिहाज से राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका है. कश्मीर में वह यह काम कर पायेगी या नहीं, यह समय बतायेगा. जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा गंठबंधन घोड़े और घास की दोस्ती जैसा लगता है. जम्मू […]

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राजनीति के हिस्से दुनिया का सबसे मुश्किल काम है विपरीत हितों के बीच सामंजस्य बैठाना, वह भी लोकतांत्रिक तरीके से. इस लिहाज से राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका है. कश्मीर में वह यह काम कर पायेगी या नहीं, यह समय बतायेगा.
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा गंठबंधन घोड़े और घास की दोस्ती जैसा लगता है. जम्मू के लोगों को लगता है कि घाटी वाले इसे कबूल नहीं करेंगे और घाटी वालों को लगता है कि यह सब तमाशा है. मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के बयान के बाद विघ्नसंतोषी बोले हम कहते थे न कि सब कुछ ठीक-ठाक चलने वाला नहीं है. पाकिस्तान और हुर्रियत की सकारात्मक भूमिका का जिक्र चल ही रहा था कि अफजल गुरु के अवशेषों की मांग सामने आ गयी. मुफ्ती के बयान की गूंज संसद में भी सुनाई पड़ी है. गंठबंधन के विरोधी तो मुखर हैं ही, भाजपा के कार्यकर्ता भी उतर आये हैं. लगता है सरकार बस अब गयी. गंठबंधन की योजना बनाते वक्त क्या इस किस्म की प्रतिक्रियाओं के बारे में सोचा नहीं गया था? गंठबंधन की कामना किसकी है? और सरकार नहीं चली तो फायदा किसे मिलेगा? आधुनिक भारत में सबसे बड़ा राजनीतिक अंतर्विरोध जम्मू-कश्मीर में देखने को मिल रहा है. इस राजनीति को जिस फॉमरूले के तहत संतुलित करने की कोशिश की जा रही है वह भी कम चमत्कारी नहीं है. सरकार चले तब और न चले तब भी. गंठबंधन के पहले दोनों पक्षों के बीच जिस न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर दस्तखत किये गये हैं उसे पढ़ा जाना चाहिए. कश्मीर एक जटिल समस्या है. इन चुनावों के बाद बात समझ में आती है कि राज्य की जनता अलग-अलग तरह से सोचती है, पर मोटी समझ है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में हिस्सा लेना एक विकल्प है. अब जन-प्रतिनिधि बैठकर रास्ता खोजें.
साझा कार्यक्रम के अनुसार चुनाव परिणामों के खंडित होने का मतलब यह नहीं कि जनादेश विभाजित है, बल्कि यह कि राज्य की राजनीति खंडित है. इस खंडित राजनीति के दो विपरीत ध्रुव एक साथ बैठकर जनादेश की जटिलता को समझना चाहते हैं. मुफ्ती का बयान और अफजल गुरु के अवशेष की मांग उस जटिलता की अभिव्यक्ति मात्र है. इससे भी ज्यादा उत्तेजक बातें सामने आ सकती हैं. यदि दोनों पक्षों को इन बातों का अनुमान है तब समाधान भी निकल आयेगा. बताया जाता है कि तकरीबन एक महीने तक भाजपा के महासचिव राम माधव और पीडीपी के नेता हसीन अहमद द्राबू के बीच चंडीगढ़, जम्मू और दिल्ली में गंठबंधन की बारीकियों पर चर्चा हुई थी. दोनों पक्ष अपने राजनीतिक जनाधार को समझते हैं और अपने कार्यकर्ता के मन को भी. यह जिम्मेवारी दोनों की है कि अपने कार्यकर्ताओं को संभालें.
यह समझौता केवल सत्ता की साङोदारी का समझौता नहीं लगता. इसमें जम्मू-कश्मीर के भीतर नियंत्रण रेखा के आर-पार सद्भाव और विश्वास पैदा करने की बात कही गयी है. कश्मीर में केवल सरकार चलाने भर का समझौता हो भी नहीं सकता. बताया जाता है कि हसीन अहमद द्राबू ने इस बात पर जोर दिया कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कश्मीर के राजनीतिक समूहों के साथ शुरू की गयी बातचीत का जिक्र भी किया जाये, जिसमें हुर्रियत भी शामिल थी. इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत की भावना से इस संवाद को फिर से शुरू करने की बात कही गयी है.
अगस्त, 2002 में हुर्रियत के नरमपंथी धड़ों के साथ अनौपचारिक वार्ता के दौरान उस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में हुर्रियत के हिस्सा लेने की संभावनाएं तक पैदा हो गयीं. उस पहल के बाद मीरवाइज उमर फारूक और सैयद अली शाह गिलानी के बीच तभी मतभेद उभरे और हुर्रियत दो धड़ों में बंट गयी. राम जेठमलानी के नेतृत्व में कश्मीर कमेटी एक गैर-सरकारी पहल थी, पर माना जाता था कि उसे केंद्र सरकार का समर्थन प्राप्त था. सरकार हुर्रियत की कई शर्ते मानने को तैयार थी, पर समझौता नहीं हो पाया.
मुख्यमंत्री बनने के बाद मुफ्ती मोहम्मद ने जो बातें कहीं हैं, उनमें हुर्रियत का जिक्र भी है. हुर्रियत के गिलानी वाले धड़े ने मुफ्ती के बयान का मजाक उड़ाया है. उसके प्रवक्ता ने कहा है कि यह ऐसे व्यक्ति का बयान है जो खुद बंधक है. मुफ्ती ने कहा था कि कश्मीर ने द्विराष्ट्र सिद्धांत को त्याग दिया है और भारत में विलय को स्वीकार कर लिया है. सरकार किसी की बने, फिलहाल राज्य में कोई ऐसी पार्टी नहीं है, जो घाटी व जम्मू दोनों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हो. ऐसे में दोनों भावनाओं के प्रतिनिधियों को आमने-सामने आना चाहिए. दो विपरीत विचारधाराओं के बीच राजनीतिक गंठबंधन लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा करता है. इस तरह एक अतिवादी समझ हावी नहीं होगी और मध्यमार्गी राज-प्रणाली विकसित होगी. सामाजिक संरचना में बहुलता है तो किसी एक पक्ष की विजय या किसी एक पक्ष की पराजय से काम नहीं होता. विपरीत परिस्थितियों में वैचारिक सामंजस्य बैठाना ही राजनीति है. राजनीति के हिस्से दुनिया का सबसे मुश्किल काम है विपरीत हितों के बीच सामंजस्य बैठाना, वह भी लोकतांत्रिक तरीके से. इस लिहाज से राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका है. कश्मीर में वह यह काम कर पायेगी या नहीं, यह समय बतायेगा. इसे मौकापरस्ती भी कह सकते हैं, पर इसका मतलब भी तो अपने हित के लिए मौके की नजाकत को समझना है. महत्वपूर्ण हैं वे हित जो इस गंठबंधन से पूरे हो रहे हैं.
भारतीय राजनीति में यह पहला मौका नहीं है जब विपरीत ध्रुवों का समन्वय हुआ है. सन 1958 में दिल्ली में जनसंघ और कम्युनिस्ट पार्टी का गंठबंधन हुआ था. लालकृष्ण आडवाणी ने ‘माइ कंट्री माइ लाइफ’ में लिखा है, ‘दिल्ली में नगर निगम की स्थापना सन 1958 में हुई. इन सभी में जनसंघ को अच्छा समर्थन प्राप्त था. 80 सदस्यों वाले निगम में हमने कांग्रेस से केवल 25 सीटें कम जीतीं. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के आठ सदस्य थे. उनके पास नगर निगम में इतनी सीटें थीं कि वे कांग्रेस या जनसंघ किसी का भी मेयर बनवा सकते थे. भाकपा ने जनसंघ को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस के साथ गंठबंधन का प्रस्ताव किया, बशर्ते कांग्रेस अरुणा आसफ अली को दिल्ली की पहली मेयर बनाने के लिए तैयार हो जाए. कांग्रेस ने यह शर्त मान ली. लेकिन आंतरिक झगड़ों के कारण यह गंठबंधन एक साल के अंदर ही टूट गया. इसके बाद जनसंघ और भाकपा के बीच समझौता हुआ कि महापौर और उपमहापौर के पद दोनों पार्टियों को बारी-बारी से दिये जायेंगे.’ चला वह भी नहीं, पर उन परिस्थितियों के बरक्स सोचें तो समझ में आता है कि राजनीति में असंभव कुछ नहीं.
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
pjoshi23@gmail.com
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