दूसरी पारी की कुछ बड़ी चुनौतियां

Published at :03 Mar 2015 12:25 AM (IST)
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दूसरी पारी की कुछ बड़ी चुनौतियां

क्रिकेट बोर्ड की नयी टीम को टीम इंडिया की लीडरशिप को लेकर अहम फैसले लेने हैं. साथ ही आइपीएल का अगला सीजन शुरू होनेवाला है. बोर्ड के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे लीग की विश्वसनीयता को बहाल किया जाये. उधर भारतीय टीम वल्र्ड कप के महासमर में अपना ताज बचाने के लिए […]

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क्रिकेट बोर्ड की नयी टीम को टीम इंडिया की लीडरशिप को लेकर अहम फैसले लेने हैं. साथ ही आइपीएल का अगला सीजन शुरू होनेवाला है. बोर्ड के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे लीग की विश्वसनीयता को बहाल किया जाये.

उधर भारतीय टीम वल्र्ड कप के महासमर में अपना ताज बचाने के लिए मजबूत दावा पेश करने में जुटी है, और इधर जगमोहन डालमिया दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड का मुखिया बनने में कामयाब रहे हैं. भारतीय क्रिकेट में ‘जग्गु दादा’ का नाम कोई नया नहीं है, लेकिन अपने जमाने में विकेटकीपर व बल्लेबाज ने बीसीसीआइ की राजनीतिक पिच पर जोरदार वापसी की है. जैसे ही यह साफ होता चला गया कि एन श्रीनिवासन बोर्ड के अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, वक्त के चक्र ने जगमोहन डालमिया और शरद पवार को एक बार फिर आमने-सामने ला खड़ा कर दिया.

एक दौर था जब भारतीय क्रिकेट को जगमोहन डालमिया अपनी ब्रीफकेस से चलाते थे. 1987 में वर्ल्‍ड कप को पहली बार इंग्लैंड से बाहर लाकर भारतीय उपमहाद्वीप में आयोजन कराने से लेकर क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था आइसीसी का प्रमुख बनने तक, डालमिया ने विश्व क्रिकेट के केंद्रबिंदु को लॉर्डस से हटा कर कोलकाता लाने मे अहम भूमिका निभायी. डालमिया ने क्रिकेट के प्रसारण मामले में भारतीय क्रिकेट को आर्थिक सुपर-पावर बनाने की नींव रखी, लेकिन वक्त ने ऐसा पलटा खाया कि डालमिया शिखर से सिफर पर चले गये. शरद पवार ने डालमिया को बीसीसीआइ की राजनीति से बेदखल कर दिया.

एक दौर ऐसा भी आया जब डालमिया पर फंड के घपले के आरोप लगे और वे बीसीसीआइ से सस्पेंड कर दिये गये. लेकिन, डालमिया ने बंगाल क्रिकेट संघ में वापसी की, कोलकाता हाइकोर्ट में मुकदमा जीता और एन श्रीनिवासन को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी, तो अंतरिम अध्यक्ष बन गये. बाद में जैसे-जैसे मैच फिक्सिंग मामले में श्रीनिवासन गुट पर शिकंजा कसता चला गया, लड़ाई एक बार फिर से जगमोहन डालमिया बनाम शरद पवार के बीच हो गयी. आखिरकार, इस्ट जोन के दो वोट डालमिया के लिए मैच विनर साबित हुए. पवार ने खुद को रेस से बाहर कर लिया और पावर डालमिया के पास दोबारा आ गयी.

अब भारतीय क्रिकेट प्रशंसक तीन अहम सवाल कर रहे हैं. पहला, क्या जगमोहन डालमिया पिछली बार की तरह एक बार फिर से एन श्रीनिवासन के डमी साबित होंगे? दूसरा, क्या बोर्ड की राजनीति में एन श्रीनिवासन राज का खात्मा हो गया है? तीसरा, यहां से भारतीय क्रिकेट राजनीति की दिशा और दशा क्या होगी? जहां तक पहले सवाल का जवाब है, डालमिया पिछली बार आपात स्थिति में बोर्ड के अंतरिम अध्यक्ष बने थे, इस बार पूर्णकालिक अध्यक्ष बने हैं. जाहिर तौर पर, जहां पिछली बार श्रीनिवासन का खड़ांव कुर्सी पर रख कर राज किया, इस बार ऐसी कोई मजबूरी नही है. दूसरा, बीजेपी के युवा नेता अनुराग ठाकुर ने करीबी लड़ाई में श्रीनिवासन के करीबी संजय पटेल को हरा कर साफ कर दिया है कि बोर्ड में अब एन श्रीनिवासन गुट का वर्चस्व खत्म हो रहा है. बोर्ड के सचिव का एक बड़ा कार्यक्षेत्र है और अनुराग ठाकुर तथा श्रीनिवासन के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है. उम्र के ढलते पड़ाव पर खड़े डालमिया को बोर्ड चलाने के लिए अनुराग ठाकुर को साथ लेकर चलना होगा. देश के लोकप्रिय खेल की राजनीति से जुड़ा अहम सवाल है कि अब भारतीय क्रिकेट किस दिशा में आगे जायेगा?

दरअसल, क्रिकेट में किस्सा कुर्सी का होने की वजह से भारतीय क्रिकेट से जुड़े कुछ सवाल हाशिये पर चले गये थे. मौजूदा विश्व कप में अब तक का प्रदर्शन भले ही अच्छा रहा हो, पर बीते चार सालों में भारत विदेश में एक भी बड़ी टेस्ट सीरीज जीतने में कामयाब नहीं रहा है. धौनी टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं और कोच डंकन फ्लेचर का कार्यकाल खत्म होनेवाला है. ऐसे में क्रिकेट बोर्ड की नयी टीम को टीम इंडिया की लीडरशिप को लेकर अहम फैसले लेने हैं. दूसरा, आइपीएल का अगला सीजन शुरू होनेवाला है. बोर्ड के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे लीग की विश्वसनीयता को बहाल किया जाये. तीसरा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब साफ है कि बोर्ड को पेशेवर और पारदर्शी बनाने के लिए ढांचागत बदलाव जरूरी है. भारत तेजी से बदल रहा है और अब बोर्ड को बंद ब्रीफकेस से नहीं चलाया जा सकता.

स्पोर्ट्स की तरह जिंदगी के किसी भी सफर में हर बदलाव एक नयी चुनौती लेकर आता है. बोर्ड की कमान भले ही एक बार फिर से 74 साल के जगमोहन डालमिया के हाथों में है, लेकिन अब नये सिरे से शुरुआत की जरूरत है. जग्गु दादा को अपनी नयी युवा टीम को साथ लेकर बदले हालात के हिसाब से फैसले लेने होंगे. उनकी पहली पारी, विश्व क्रिकेट के भूगोल में पहचान के लिए संघर्ष की लड़ाई थी. उस लड़ाई को अपने साथियों के साथ मिल कर डालमिया ने जीता. दूसरी पारी, साख बहाल करने की लड़ाई है. इस लड़ाई को जीतने के लिए डालमिया और टीम को नये सिरे से, नये फॉमरूलों से शुरुआत करने की जरूरत है.

अभिषेक दुबे

वरिष्ठ खेल पत्रकार

abhishekdubey1975@gmail.com

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