जनता को है ‘फूल खिलने’ का इंतजार

Published at :02 Mar 2015 12:14 AM (IST)
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जनता को है ‘फूल खिलने’ का इंतजार

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले पूर्णकालिक बजट के शुरू में ही आम जन से लेकर कॉरपोरेट क्षेत्र की अपेक्षाओं तथा आकांक्षाओं के ‘फूल खिलाने’ की जिम्मेवारी के रेखांकन के साथ यह भी कहा कि इस राह में मुश्किल के रूप में ‘कांटे कई पुराने हैं.’ यह बजट आर्थिक सुधारों को तेज कर भारतीय […]

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वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले पूर्णकालिक बजट के शुरू में ही आम जन से लेकर कॉरपोरेट क्षेत्र की अपेक्षाओं तथा आकांक्षाओं के ‘फूल खिलाने’ की जिम्मेवारी के रेखांकन के साथ यह भी कहा कि इस राह में मुश्किल के रूप में ‘कांटे कई पुराने हैं.’ यह बजट आर्थिक सुधारों को तेज कर भारतीय अर्थव्यवस्था को द्विअंकीय विकास दर की ‘उड़ान देने’ की कोशिश से लबरेज है.

लेकिन, मध्य वर्ग, खास कर निम्न मध्य वर्ग, के लिए करों में छूट न देने और अप्रत्यक्ष करों को बढ़ाने से एक बड़ी आबादी को निराश भी कर गया है. खास बात यह है कि इसमें मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर में सरकारी खर्च का दायरा बहुत व्यापक किया गया है, जिससे विकास को गति मिलने की संभावना है. हालांकि इससे पूंजी-निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित होगी और वित्तीय घाटा बढ़ सकता है.

इन क्षेत्रों में पर्याप्त सार्वजनिक निवेश के बिना न तो बड़े पैमाने पर रोजगार-सृजन हो सकता है, न ही निजी निवेश तथा बाजार में भरोसे का संचार किया जा सकता है, जो कि अर्थव्यवस्था की प्रगति की आवश्यक शर्त है. बजट से पूर्व महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी समेत कई कल्याणकारी योजनाओं के आवंटन और सब्सिडी में भारी कटौती की आशंका व्यक्त की जा रही थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया है. मनरेगा सहित कुछ योजनाओं का आवंटन बढ़ा है, और जिन योजनाओं में कमी की गयी है, वह वित्त आयोग की सिफारिशों के कारण राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 42 फीसदी करने और कुछ योजनाओं को राज्यों के जिम्मे कर देने के कारण है. सब्सिडी के पात्र हाथों में न पहुंचने की चिंता लंबे समय से जतायी जाती रही है. जेटली ने सब्सिडी को सीधे खाते में हस्तांतरित कर और सूचना तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ा कर, सब्सिडी की लूट रोकने की पहल की है.

आंकड़े और घोषणाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रस्तावों को अमलीजामा पहनाकर उसका लाभ विभिन्न तबकों तक पहुंचाना भी जरूरी हैं. उच्च वर्ग और उद्योग को दी गयी राहतों के कारण बजट धनिकों के पक्ष में खड़ा दिख रहा है. अब ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ के आदर्श के अनुरूप सरकार के सामने आम जन को रोजगार और अन्य आर्थिक अवसर मुहैया कराने की चुनौती है, जो उसका राजनीतिक वादा भी है और जिम्मेवारी भी.

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