काश! कुदाल नहीं केतली पकड़ी होती

Published at :26 Feb 2015 3:23 AM (IST)
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काश! कुदाल नहीं केतली पकड़ी होती

नरेंद्र जी नमस्कार, सबसे पहले यह कि हम आपको मोदी जी की जगह नरेंद्र क्यों संबोधित कर रहे हैं. हमें टीवी से मालूम हुआ कि आप अपने करीबियों को कुलनाम से नहीं, बल्कि रखे गये नाम से पुकारते हैं. पिछले दिनों आपने ओबामा को ‘बराक ’ कह कर उनसे अपनी नजदीकी जाहिर की. अब हम […]

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नरेंद्र जी नमस्कार,

सबसे पहले यह कि हम आपको मोदी जी की जगह नरेंद्र क्यों संबोधित कर रहे हैं. हमें टीवी से मालूम हुआ कि आप अपने करीबियों को कुलनाम से नहीं, बल्कि रखे गये नाम से पुकारते हैं. पिछले दिनों आपने ओबामा को ‘बराक ’ कह कर उनसे अपनी नजदीकी जाहिर की. अब हम आपसे कोई कम नजदीक तो हैं नहीं कि आपको मोदी जी कहके आपके और अपने रिश्ते की बेहुरमती करें. हमने आपको अच्छे दिन के लालच में वोट दिया. जोश में पुरखों की यह सीख भी भूल गये कि लालच बुरी बला है. और, जो ज्यादा मीठे बोलता है, वही दगा देता है- ‘टेढ़ुआ चंदन मधुरी बानी, दगाबाज की यही निशानी’.

लेकिन जब तक कोई जाल में नहीं फंसता, सीख समझ में कहां आती है? बहेलिये के जाल में फंसे बगैर ये बात न कबूतर न समझ पाये थे और न हम बेचारे समझ पाये. अभी गांव में यूरिया के लिए हाहाकार मचा हुआ है. चुनाव के दौरान आप अपने भाषणों में हमें कितनी इज्जत से ‘अन्नदाता’ कहते थे, वही अन्नदाता बोरी भर यूरिया के लिए पुलिस की लाठी खा रहा है. कालाबाजार में, 290 रुपये की बोरी 500-600 रुपये में खरीद रहा है. खेती बरसों से घाटे का धंधा बनी हुई है.

पर क्या करें, पुरखों का काम इतना आसानी से छोड़ भी तो नहीं सकते? दादा-आजा कहते थे- ‘उत्तम खेती, मध्यम बान (व्यापार), निषिद्ध चाकरी, भीख निदान’. लेकिन, उनकी यह शिक्षा अब मिथ्या मालूम पड़ रही है. वो मूरख थे जो उनकी बातों में आकर हल-बैल में फंसे रहे. हमारे बाप-दादा ने अगर खेती छोड़ चाय बेचनी शुरू कर दी होती, और हमें बचपन में कुदाल की जगह केतली पकड़ा दी होती, तो आज हम भी शायद आपकी तरह प्रधानमंत्री बन जाते.

आपने कहा था कि हमारी सरकार बनाइए, फसल की कीमत लागत का डेढ़ गुना मिलेगी. पर आपने बनारस के ठगों को भी मात कर दिया. गेहूं का समर्थन मूल्य 50 पैसे किलो बढ़ाया है आपने! नरेंद्र भाई, इतना भी एहसान करने की क्या जरूरत? यह अठन्नी भी हमारी ओर से किसी अडानी-अंबानी को दे दीजिए. हमारा गेहूं साढ़े चौदह रुपये किलो लिया जायेगा और सेठ लोग उससे आटा बना कर 30-35 रुपये किलो बेचेंगे. सेठों की चक्की है या पल में पैसा दुगना करने का जादू? खैर, कम और गम खाने की हमारी आदत है. हम ये ङोल लेंगे. लेकिन आप तो हमें जड़ से उखाड़ने पर तुल गये हैं. हमारी जमीन छीनने का काूनन ले आये हैं. खुल्लमखुल्ला कह रहे हैं : मैं चाहे इसकी जमीन लूं, मैं चाहे उसकी जमीन लूं, मेरी मरजी/ खेत में मॉल बनवाऊं या कैसीनो खुलवाऊं मेरी मरजी.. नरेंद्र भाई, कुछ तो रहम करो. गरीबों की बददुआ लगेगी, तो आपके पांव तले की भी जमीन नहीं बचेगी.

-आपसे नाउम्मीद किसान

सत्य प्रकाश चौधरी

प्रभात खबर, रांची

satyajournalist@gmail.com

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