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जो सीमा पर नहीं हारा, वो दिल्ली में हार गया

Updated at : 21 Feb 2015 12:51 AM (IST)
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जो सीमा पर नहीं हारा, वो दिल्ली में हार गया

पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार इलाज की कमी से बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की यह पहली घटना नहीं है. क्या हमारे राजनेता और नौकरशाह कभी यह सोचते होंगे कि जो देश स्वाइन फ्लू का इलाज नहीं कर सकता, वह महाशक्ति बनने के सपने कैसे देख लेता है! जम्मू के एसपी की मौत […]

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पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार
इलाज की कमी से बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की यह पहली घटना नहीं है. क्या हमारे राजनेता और नौकरशाह कभी यह सोचते होंगे कि जो देश स्वाइन फ्लू का इलाज नहीं कर सकता, वह महाशक्ति बनने के सपने कैसे देख लेता है!
जम्मू के एसपी की मौत स्वाइन फ्लू से हो गयी. गाजियाबाद के डीएम स्वाइन फ्लू से अस्पताल पहुंच चुके हैं. राजस्थान के दो मंत्री स्वाइन फ्लू की गिरफ्त में आ गये. आलम यह है कि देश में जितने भी स्वाइन फ्लू के मरीज अस्पताल तक पहुंच रहे हैं, उनमें से करीब आधे की मौत हो चुकी है. साढ़े सत्तरह सौ से ज्यादा मरीज अस्पतालों में पहुंचे, जिनमें से करीब 300 की छुट्टी दवाई देकर कर दी गयी, लेकिन बाकी मरीजों में से मौत का आंकड़ा सात सौ पार कर चुका है.
आखिर जिस तरह स्वास्थ सेवा को निजी मुनाफे के लिए देशभर में बांट दिया गया है, उसके एवज में अस्पताल का मतलब क्या सिर्फ मुनाफा कमाना है? निजी अस्पतालों के मुनाफे का बजट बताता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट से करीब साढ़े तीन सौ गुना पैसा निजी अस्पताल कमा लेते हैं और सरकारी अस्पतालों में इलाज के नाम पर राज्यों में जिस तरह एनआरएचएम के जरिये करोड़ों के घोटाले सामने आ रहे हैं, उसने यह तो संकेत दे ही दिये हैं कि सरकार लोगों को स्वास्थ सेवा देने की जिम्मेवारी से पूरी तरह मुक्त है.
देश के सोलह राज्यों में स्वाइन फ्लू दस्तक दे चुका है, तो दिल्ली में स्वाइन फ्लू के इलाज की क्या हालत है, इसे जरा इस सच को पढ़ कर समझ लें. तब समझ में आयेगा कि भारत क्यों तीसरी दुनिया के देशों में भी आखिरी कतार में है.
एक सैनिक ने बॉर्डर पर दुश्मनों का सामना किया. उसे कोई परेशानी नहीं हुई. 26/11 हमले के वक्त वह बतौर कमांडो तैनात था. आतंकियों को ठिकाने लगाने में भी उसे कोई परेशानी नहीं हुई. लेकिन कुछ ही दिन पहले दिल्ली में अस्पतालों की हालत ने इसकी रूह कंपा दी. दिल्ली के शीर्ष अस्पतालों में स्वाइन फ्लू के इलाज के लिए आइसीयू का बेड तो दूर, सुरक्षा हेतु एन95 किट तक नहीं हैं.
इन हालातों में सेना की वर्दी पहने कमांडो दिल्ली की सड़कों पर छह घंटे तक सिर्फ इसलिए भटकता रहा कि कहीं भी स्वाइन फ्लू से प्रभावित उसकी चाची का इलाज हो जाये. सिर्फ एक बेड का इंतजाम कराने के लिए दिल्ली में किस-किस से फोन कराने पड़ते हैं. बेड मिल जाता है, तो इलाज नहीं मिलता. डॉक्टर, नर्स खुद बीमार हैं. आइसीयू में वेंटिलेटर नहीं है. उसी दिल्ली में, जिसे डिजिटल से लेकर स्मार्ट बनाने के सियासी नारे लग चुके हैं. दुनिया के नक्शे पर इसे चमकाने का ऐलान हो चुका है. ऐसे में जो जवान कभी सीमा पर नहीं डिगा, वह दिल्ली की बदहाली पर डिग गया.
यह सच बीते दिनों का है. रोहतक में रहनेवाली प्रेमा देवी की तबियत बिगड़ी. उनके बेटे ने दिल्ली में अपने चचेरे भाई को फोन किया. दिल्ली में तैनात सेना के इस कमांडो ने तुरंत पंजाबी बाग में महाराजा अग्रसेन अस्पताल में आइसीयू में भर्ती कराया गया. इलाज शुरू हुआ. जांच में जैसे ही एच1एन1 पॉजिटिव पाया गया, वैसे ही अस्पताल में अफरा-तफरी मच गयी. अस्पताल वालों ने तुरंत प्रेमा देवी को कहीं और शिफ्ट करने को कहा. दोपहर के दो बजे अस्पताल ने अल्टीमेटम दे दिया कि मरीज को ले जायें, अन्यथा मुश्किल हो जायेगी.
फिर शुरू हुआ अस्पताल-दर-अस्पताल भटकने का सिलसिला. दिल्ली के शीर्ष निजी अस्पतालों का दरवाजा खटखटाया गया. सब जगह एक ही जवाब मिला-आइसीयू में बेड खाली नहीं है. हर तरह से कोशिश शुरू हुई. कहीं किसी के कहने से कोई बेड मिल जाये. लेकिन नहीं मिला. फिर सरकारी अस्पतालों के भी चक्कर लगने शुरू हुए.
कहीं आइसीयू में बेड नहीं मिला. रात के आठ बजे तो जवान ने राष्ट्रपति भवन में तैनात अपने सहयोगी को सारी जानकारी दी. किसी तरह व्यवस्था कर कहा गया कि आरएमएल अस्पताल में जानकारी दे दी गयी है. वहां बेड मिल जायेगा. बहरहाल, वर्दी में जवान को देख कर अस्पताल में एक नर्स ने बताया कि रिसेप्शन पर जाकर वहां पर्ची भरनी है और मरीज को लाकर बेड पर लिटा देना है.
स्वाइन फ्लू से तड़पती प्रेमा देवी अस्पताल की पार्किग में खड़ी एंबुलेंस में थीं. उन्हें खुद ही उठा कर लाया गया. लेकिन आइसीयू में बिना एम95 किट के जायें कैसे, तो जवाब मिला. रूमाल बांध कर चले जाइए. अंदर कई बेड खाली थे. लेकिन इलाज नादारद था. स्वाइन फ्लू वार्ड में तैनात एक डॉक्टर और दो नर्स बीमार थीं. उन्हें कोई देखनेवाला भी नहीं था.
स्वाइन फ्लू का सीधा असर सांस लेने पर पड़ता है. लेकिन आइसीयू में वेंटिलेटर तक नहीं था. इस बीच तीन मरीज और पहुंचे. अस्पताल प्रबंधन ने कहा बेड खाली नहीं है. चाहिए तो ऊपर से कहला दीजिए. जवान यह सुन कर अंदर से हिल गया. देश के लिए अपनी जान पर खेलनेवाले जवान को कुछ समझ में नहीं आया. उसने सवाल करने शुरू किये. वर्दी देख कर जवाब तो किसी ने नहीं दिया, लेकिन मरीजों को जगह भी नहीं दी. सिर्फ बेड पर लिटा दिया गया. फिर दो घंटे बाद करीब साढ़े दस बजे कार्डिक अरेस्ट हुआ.
उसके बाद लंग्स फेल हुए. फिर लीवर फेल हुआ. और इस तरह जांच के लिए इधर-उधर भागते-दौड़ते रात के एक बज गये. डेढ़ बजे नर्स ने डॉक्टर से जानकारी लेकर परिजनों को बताया कि प्रेमा देवी नहीं रहीं. लेकिन उनकी मौत स्वाइन फ्लू से हुई है, तो वायरस इनके शरीर में है, इसलिए खुली बॉडी ले जाना ठीक नहीं है. और तुरंत अंतिम संस्कार करना होगा. नहीं तो शरीर के नजदीक आनेवाले किसी के भी शरीर में वायरस जा सकते हैं.
रोहतक से दिल्ली के लिए चलीं प्रेमा देवी को जिसने भी देखा था, उसे यह उम्मीद नहीं थी कि वे अब जीवित नहीं लौटेंगी. एंबुलेंस में लेट कर दिल्ली ठीक होने के लिए पहुंची प्रेमा देवी का शरीर गठरी की तरह एयर टाइट होकर दूसरे दिन जब रोहतक पहुंचा, तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि चौबीस घंटे के भीतर दिल्ली ने इलाज की जगह मौत कैसे दे दी. स्वाइन फ्लू से मरे मरीज को जिसने भी सुना वह स्वाइन फ्लू का नाम सुन कर ही खौफजदा हो गया. दिल्ली में इलाज के नाम पर कैसे क्या हुआ, इसे ना बेटे ने और ना ही भतीजे ने गांव में किसी को बताया. दिल्ली को लेकर मोहभंग अभी भी किसी का हुआ नहीं है.
उसके बाद भी रोहतक के दो और जिंद के तीन स्वाइन फ्लू के मरीज दिल्ली पहुंचे. सेना का जवान अब एक ही सवाल कर रहा है कि जब दिल्ली का यह हाल है, तो देश का क्या होगा. इस बीच देशभर में स्वाइन फ्लू से मरनेवालों की संख्या 700 से पार कर चुकी है, और हमारे प्रधानमंत्री ने विश्व कप क्रिकेट खेलनेवाले देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बधाई दी है.
बहरहाल, इलाज की कमी से बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की यह पहली घटना नहीं है. क्या हमारे राजनेता और नौकरशाह कभी यह सोचते होंगे कि जो देश स्वाइन फ्लू का इलाज नहीं कर सकता, वह महाशक्ति बनने के सपने कैसे देख लेता है!
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