स्थानीयता पर शह और मात का खेल
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :19 Feb 2015 3:01 AM (IST)
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कैसी विडंबना है कि क्षेत्रवाद को राष्ट्रीयता व स्वस्थ राजनीति के लिए त्याज्य माना जाता है, लेकिन 14 सालों से झारखंड में स्थानीयता के मसले को लेकर रह-रह कर कोहराम मचता रहता है. लगातार पिछड़ते जा रहे इस राज्य में विकास को किसी भी पार्टी ने अपने एजेंडे में पहले स्थान पर नहीं रखा. विकास […]
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कैसी विडंबना है कि क्षेत्रवाद को राष्ट्रीयता व स्वस्थ राजनीति के लिए त्याज्य माना जाता है, लेकिन 14 सालों से झारखंड में स्थानीयता के मसले को लेकर रह-रह कर कोहराम मचता रहता है. लगातार पिछड़ते जा रहे इस राज्य में विकास को किसी भी पार्टी ने अपने एजेंडे में पहले स्थान पर नहीं रखा.
विकास का कोई खाका जो स्थानीय संसाधनों पर आधारित हो, किसी ने भी नहीं बनाया. यह सब करने के लिए जिस स्पष्ट दृष्टि, कौशल, अनुभव और दक्ष नेतृत्व की दरकार होती है, वह इस राज्य में लगातार घटता जा रहा है. एक स्वप्नद्रष्टा समाज को संघर्ष और चुनौतियों से जूझने का जज्बा ऊपर उठाता है, पर झारखंड लगभग हमेशा आरक्षण, स्थानीयता, बाहरी-भीतरी की लड़ाई में उलझा रहा है. जिसे भी नेतृत्व का मौका मिला उसने अपने-अपने तरीके से इस भावना को भड़काया.
आज बाबूलाल मरांडी और हेमंत सोरेन ने स्थानीयता की नीति को लड़ाई का पहला एजेंडा बनाया है, उन्हें पहले खुद से पूछना चाहिए कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते इस दिशा में क्या किया. उन्हें इस पर भी आत्ममंथन करना चाहिए कि उन्होंने अपने कार्यकाल में जो भी किया वह झारखंड को कहां लेकर गया. सत्ता पाने या पार्टी की अस्तित्व रक्षा के लिए एक मंच पर आये झामुमो और झाविमो का स्वर अब भी एक नहीं है. एक तरफ हेमंत सोरेन हैं जो स्थानीयता के मसले पर अतिवादी होते प्रतीत होते हैं. वह स्थानीयता के लिए खतियानी आधार की वकालत करते हैं.
तो दूसरी ओर बाबूलाल मरांडी हैं जिनके सुर बड़े ही नरम प्रतीत होते हैं. झारखंड में जन्मे, पले-बढ़े को वह झारखंडी मानने की बात करते हैं. झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन भी कई दफा झारखंड में जन्मे और पले-बढ़े को झारखंडी मानने की वकालत करते रहे हैं. यदि सचमुच ऐसा है तो टकराव किस बात का. नीति की आवश्यकता फिर कहां रहती है? दरअसल संकट स्थानीयता और बाहरी का नहीं, संकट अपने राजनीतिक आधार को दृढ़ करने का है. झारखंड के आदिवासियों, मूलवासियों के हितों से ज्यादा चिंता इन नेताओं को अपने जनाधार की है. स्थानीयता का मसला ही वह मैदान है, जहां क्षेत्रीय दल भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मात दे सकते हैं. सो, राजनीति चालू है.
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