सब्सिडी के मसले पर हो गंभीर बहस

Published at :18 Feb 2015 6:21 AM (IST)
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सब्सिडी के मसले पर हो गंभीर बहस

दिल्ली चुनाव में आप ने वादा किया था कि उसकी सरकार बिजली के दाम आधे करेगी. लेकिन, अच्छे दिनों के नारे के साथ केंद्र की सत्ता में पहुंची भाजपा दिल्ली में आप की जीत और वादों से असहज दिख रही है. तभी तो प्रधानमंत्री ने तंज कसा है कि जिनके पास बिजली नहीं है, वे […]

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दिल्ली चुनाव में आप ने वादा किया था कि उसकी सरकार बिजली के दाम आधे करेगी. लेकिन, अच्छे दिनों के नारे के साथ केंद्र की सत्ता में पहुंची भाजपा दिल्ली में आप की जीत और वादों से असहज दिख रही है. तभी तो प्रधानमंत्री ने तंज कसा है कि जिनके पास बिजली नहीं है, वे मुफ्त बिजली देने की बात करते हैं. एक तो आप ने मुफ्त बिजली देने का वादा नहीं किया था, दाम घटाने की बात कही थी और ऐसा ही वादा भाजपा व कांग्रेस का भी था.

दूसरी बात यह कि भाजपा भी आम चुनाव में पंजाब के किसानों से कमोबेश यही वादा कर चुकी थी, जबकि पंजाब को भी गर्मियों में बाहर से बिजली खरीदनी पड़ती है. ठीक है कि दिल्ली अपनी जरूरत का महज 49 प्रतिशत बिजली उत्पादित करती है, शेष के लिए उसे दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है. यही हालत पानी की भी है, जिसके लिए हरियाणा सरकार की मेहरबानी का मुंह देखना पड़ता है.

प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार में कहा था कि दिल्ली और हरियाणा में एक ही पार्टी का शासन हो, तो दिल्लीवालों को पानी की किल्लत से निपटने में सुविधा होगी. अब, दिल्ली और केंद्र के बीच बयानों की रस्साकशी पर गौर करें, तो दिखेगा कि मुख्य सवाल आर्थिक नीतियों में जनता की बुनियादी जरूरतों की प्राथमिकता का है. कोई भी शासन इन बुनियादी जरूरतों की अनदेखी नहीं कर सकता. संविधान के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि गरिमापूर्वक जीवन जीने के अधिकार में यह शामिल है कि नागरिकों को बुनियादी जरूरत की चीजें राज्यसत्ता मुहैया कराये. संघीय ढांचे में केंद्र को संसाधनों को बंटवारे के संदर्भ में बेशुमार अधिकार प्राप्त हैं, तो उसकी जिम्मेवारी बनती है कि इन अधिकारों का इस्तेमाल वह संसाधनों के न्यायसंगत बंटवारे में करे. देश में अमीरों की 10 फीसदी आबादी अधिकतम संसाधनों पर काबिज है, जिन्हें समय-समय पर भारी-भरकम कर राहत दी जाती है.

ऐसे में बुनियादी जरूरत के सामान और सेवाओं पर दी जानेवाली सब्सिडी को ‘खैरात’ और ‘मुफ्तखोरी’ की संज्ञा देना असल में नागरिकों को जायज हक से वंचित करने और असमानता की खाई को और ज्यादा चौड़ा करने जैसा है. उम्मीद करनी चाहिए कि सब्सिडी के मसले पर देश में फिर से एक गंभीर बहस की शुरुआत होगी.

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