विपक्ष की गोलबंदी का एक साझा मुद्दा

Published at :20 Jan 2015 5:50 AM (IST)
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विपक्ष की गोलबंदी का एक साझा मुद्दा

भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 में अध्यादेश के जरिये संशोधन के खिलाफ झारखंड में राजनीतिक माहौल बनने लगा है. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार औद्योगीकरण और विकास के लिए जमीन की जरूरत बताते हुए अध्यादेश लेकर आयी है, जिसमें रैयत की सहमति के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है. झारखंड के मुख्य विपक्षी दल झारखंड […]

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भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 में अध्यादेश के जरिये संशोधन के खिलाफ झारखंड में राजनीतिक माहौल बनने लगा है. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार औद्योगीकरण और विकास के लिए जमीन की जरूरत बताते हुए अध्यादेश लेकर आयी है, जिसमें रैयत की सहमति के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है. झारखंड के मुख्य विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोरचा ने इसे मुद्दा बनाने की तैयारी कर ली है. झामुमो 28 जनवरी से आंदोलन शुरू करेगा जिसमें भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन एक प्रमुख विषय होगा. यह आंदोलन प्रखंड मुख्यालय, जिला मुख्यालय से होता हुआ राज्य की राजधानी तक पहुंचेगा. पार्टी ने 31 मई को मोरहाबादी मैदान में जन-आक्रोश रैली करने का एलान किया है.

भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के खिलाफ विभिन्न जन संगठन भी एकजुट हो रहे हैं. सोमवार को रांची में आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच के तत्वावधान में रैली का आयोजन किया गया. इसमें कहा गया कि ताजा अध्यादेश पूंजीपतियों को जमीन लूट की छूट देने के लिए है. रैली में शामिल लोगों ने भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 को पुराने स्वरूप में बहाल करने की मांग की. वामपंथी दलों ने भी भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के खिलाफ कमर कसनी शुरू कर दी है.

इस पर उनकी संयुक्त बैठक हो चुकी है. अब वे इसे जन संगठनों और अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिल कर आंदोलन की शक्ल देने की तैयारी कर रहे हैं. 16 मई को कॉमरेड महेंद्र सिंह के शहादत दिवस के मौके पर विभिन्न जगहों पर आयोजित भाकपा (माले) के आयोजनों में सभी वक्ताओं ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के अध्यादेश पर जम कर प्रहार किया और आंदोलन की बात की. कांग्रेस खुद को भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 का जनक मानती है, इसलिए उसे इस मुद्दे पर विपक्ष के साथ खड़ा होना ही पड़ेगा. यह सब बता रहा है कि विपक्ष, झारखंड की भाजपा सरकार के खिलाफ भूमि अधिग्रहण को लेकर मोरचा खोलने जा रहा है. जमीन झारखंड के लिए एक संवदेनशील मुद्दा है. राज्य की फिजा में कई बार ‘जान देंगे, पर जमीन नहीं देंगे’ के नारे गूंज चुके हैं. ऐसे में जमीन के सवाल पर गोलबंदी करने का मौका विपक्ष छोड़ना नहीं चाहेगा.

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