मजहब की दीवार से परे है भाषा
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :05 Jan 2015 5:35 AM (IST)
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इस दौर में जब भाषा को लेकर विभिन्न समुदायों के बीच दीवार खड़ी करने की तिकड़म रची जा रही हो, बिहार से एक उम्मीद जगाने वाली खबर आयी है. बिहार मदरसा बोर्ड द्वारा आयोजित मौलवी और फोकानिया की परीक्षा में गैर मुसलिम छात्र-छात्रओं की संख्या न केवल बढ़ रही है, बल्कि वे तुलनात्मक रूप से […]
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इस दौर में जब भाषा को लेकर विभिन्न समुदायों के बीच दीवार खड़ी करने की तिकड़म रची जा रही हो, बिहार से एक उम्मीद जगाने वाली खबर आयी है. बिहार मदरसा बोर्ड द्वारा आयोजित मौलवी और फोकानिया की परीक्षा में गैर मुसलिम छात्र-छात्रओं की संख्या न केवल बढ़ रही है, बल्कि वे तुलनात्मक रूप से बेहतर प्रदर्शन भी कर रहे हैं.
पिछले साल मैट्रिक के समकक्ष फोकानिया की परीक्षा में जो 74648 विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए, उनमें 2466 विद्यार्थी मुसलिम नहीं थे. इसी तरह मौलवी (इंटरमीडियट) की परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले 50435 में से 2637 विद्यार्थी गैर मुसलिम थे. गैर मुसलिम विद्यार्थियों का बिहार मदरसा बोर्ड की परीक्षा से जुड़ाव किसी सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर चलाये गये अभियान का नतीजा नहीं है. इसके पीछे बेहतर कैरियर या रोजगार की संभावना की तलाश एक वजह हो सकती है. लेकिन, यह हिंदी-उर्दू की साझी विरासत को भी अभिव्यक्त करता है. दोनों भाषाएं एक ही मूल से पिछली चार सदियों में विकसित हुई हैं.
अंगरेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत वर्ष 1800 में हिंदी और उर्दू को दो पृथक भाषाओं के रूप में अलग कर दिया था. हालांकि यह दोनों भाषाओं के बीच के रिश्तों की मजबूती ही है कि आज भी रोजमर्रा के व्यवहार में बोलचाल के स्तर पर उनके बीच अन्योन्याश्रय संबंध कायम हैं. हिंदी और उर्दू का एक-दूसरे से अलगाव बेहद मुश्किल है. दुर्भावनावश उर्दू को एक खास मजहब के साथ जोड़ कर देखनेवाले और इसे हिंदी के समानांतर खड़ा करने की कोशिश करनेवाले शायद यह नहीं जानते कि इन दोनों भाषाओं में संज्ञा, सर्वनाम, क्रियापद और वाक्य रचना तक समान है.
इस रागात्मक रिश्ते को नया आयाम मिलेगा, तो इससे किसी एक भाषा को खतरा नहीं है, बल्कि इससे दोनों को मजबूती ही मिलेगी. इससे कौन इनकार करेगा कि मीर तकी मीर, मिर्जा गालिब, फैज, शाद आदि की रचनाएं जब देवनागरी लिपि में आयीं, तो वे पहले की बनिस्पत ज्यादा लोकप्रिय हुईं. यदि बिहार ने हिंदी और उर्दू की साझी विरासत और साझी परंपरा को नये संदर्भ में रेखांकित किया है, तो इसका न केवल स्वागत किया जाना चाहिए, बल्कि इसे विस्तार देने की भी जरूरत है.
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