झारखंड में प्रतिबद्ध नेतृत्व का रहा है अभाव

जॉर्ज मैथ्यू चेयरमैन, इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल साइंस राज्य को बने 14 वर्ष ही हुए हैं, लेकिन इस दौरान 9 मुख्यमंत्री बन चुके हैं. ऐसे में राजनीतिक अस्थिरता के कारण नीतियों के क्रियान्वयन में एकरूपता की कमी रही और सरकार चलानेवाले सिर्फ अपनी-अपनी सत्ता बचाने की जुगत में लगे रहे और इससे प्रशासन के कामकाज पर […]
जॉर्ज मैथ्यू
चेयरमैन, इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल साइंस
राज्य को बने 14 वर्ष ही हुए हैं, लेकिन इस दौरान 9 मुख्यमंत्री बन चुके हैं. ऐसे में राजनीतिक अस्थिरता के कारण नीतियों के क्रियान्वयन में एकरूपता की कमी रही और सरकार चलानेवाले सिर्फ अपनी-अपनी सत्ता बचाने की जुगत में लगे रहे और इससे प्रशासन के कामकाज पर प्रतिकूल असर पड़ा. नौकरशाही तभी सही तरीके से काम करती है, जब उसका शीर्ष नेतृत्व प्रभावशाली हो.
कोई भी राज्य तभी प्रगति कर सकता है, जब वहां प्रतिबद्ध, वैचारिक तौर पर संपन्न और दूरदर्शी नेतृत्व हो. नेतृत्व की बदौलत ही कोई राज्य विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ सकता है. अच्छा नेतृत्व समाज में सही संदेश देने का काम करता है. लेकिन दुर्भाग्यवगश झारखंड में शुरू से ही इसकी कमी रही है. वहां के राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति की कमी साफ तौर पर दिखी है. कोई भी प्रगतिशील राज्य जैसे-केरल, पश्चिम बंगाल आदि राजनीतिक नेतृत्व की बदौलत ही आगे बढ़ने में कामयाब रहे हैं.
झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है. आदिवासी बहुल राज्यों में शिक्षा एक बुनियादी समस्या रही है. ऐसी उम्मीद थी कि झारखंड गठन के बाद इस बुनियादी समस्या को दूर करने की कोशिश की जायेगी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और झारखंड का भविष्य बिखरता चला गया. शिक्षा का मतलब होता है लोगों के भविष्य के लिए निवेश. शिक्षा से ही सामाजिक पूंजी का निर्माण होता है. अच्छी शिक्षा व्यवस्था मानव संसाधन का निर्माण करती है. अच्छे समाज का निर्माण करती है. ईमानदार सोच का निर्माण करती है. ऐसे में स्थानीय शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान देकर और वहां के स्थानीय लोगों की क्षमता को बढ़ावा देकर झारखंड को एक विकसित राज्य बनाया जा सकता था. और जाहिर है कि इसका सभी को लाभ भी मिलता होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोई भी राज्य या देश बिना बेहतर शिक्षण संस्थानों के तरक्की नहीं कर सकता है, चाहे वहां संसाधनों की कितनी भी उपलब्धता क्यों न हो और चाहे वहां खनिज का कितना भी भंडार क्यों न हो. इसे एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है और आगे चल कर इस पर अमल भी किया जा सकता है. केरल में प्राकृतिक संसाधन की उपलब्धता नाम मात्र की है, लेकिन बेहतर शिक्षण व्यवस्था के कारण देश के अग्रणी राज्यों में उसकी गिनती होती है.
दूसरी बात यह है कि लोगों में निवेश के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए. उम्मीद थी कि झारखंड राज्य बनने के बाद सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा. लेकिन लंबे समय तक वहां पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश नहीं की गयी. पंचायती राज व्यवस्था की कमजोरी के कारण स्थानीय स्तर पर विकास सही तरीके से नहीं हो पाया, जिससे कि सत्ता कुछ लोगों के हाथों तक सिमट कर रह गयी और इससे भ्रष्टाचार को खूब बढ़ावा मिला. राजनीतिक जवाबदेही की कमी और संस्थाओं की कमजोरी के कारण झारखंड में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला. यही कारण है कि प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता विकास की बजाय भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु बन गयी. नेता से लेकर नौकरशाह तक राज्य का विकास करने के बजाय संसाधनों की लूट में शामिल हो गये. आज झारखंड की जो हालत है, यह उसी लूट का परिणाम है.
हालांकि कुछ लोगों का यह कहना है कि वहां नक्सलियों के पांव पसारने के कारण संसाधनों को उपयोग अच्छी तरह से नहीं हो रहा है या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में संसाधनों को सही-सही व्यवस्थित नहीं किया जा सकता है. लेकिन, मेरा यह मानना है कि यह कहना गलत है कि नक्सल समस्या के कारण राज्य का विकास नहीं हो पा रहा है. हमें यह याद रखना होगा कि नक्सल आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल से हुई थी, लेकिन आज वहां नक्सल समस्या नहीं है. अगर कुछ क्षेत्रों में है भी, तो उतना प्रभावी नहीं है, क्योंकि वहां का राजनीतिक नेतृत्व इस बात को समझ कर विकास के लिए संसाधनों का सही इस्तेमाल करता है, न कि उसकी लूट में लग जाता है. ठीक उसी तरह केरल और काफी हद तक आंध्र प्रदेश में नक्सल समस्या अब नहीं है या है भी तो प्रभावी तौर पर नहीं है.
आखिर क्या वजह है कि झारखंड जैसे राज्य में नक्सल समस्या कम होने की बजाय बढ़ी है. मेरा मानना है कि इसकी मुख्य वजह स्थानीय लोगों का समुचित विकास का न होना है. आज भी झारखंड के कई क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं लोगों को नसीब नहीं है. सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों को नहीं मिल पाया है. स्थानीय स्तर पर रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं हैं. विकास के नाम पर आदिवासियों को विस्थापन का सामना करना पड़ रहा है. इसी विस्थापन की विभीषिका और रोजगार की प्रचंड समस्या के कारण नक्सलियों का प्रभाव झारखंड में कम होने की बजाय और भी बढ़ता रहा है.
झारखंड में आबादी के लिहाज से गरीबों की संख्या काफी अधिक है. लेकिन वहां की सरकारों ने लोगों के सामाजिक और आर्थिक हालात सुधारने की दिशा में कोई काम नहीं किये. राज्य को बने 14 वर्ष ही हुए हैं, लेकिन इस दौरान 9 मुख्यमंत्री बन चुके हैं. ऐसे में राजनीतिक अस्थिरता के कारण नीतियों के क्रियान्वयन में एकरूपता की कमी रही और सरकार चलानेवाले सिर्फ अपनी-अपनी सत्ता बचाने की जुगत में लगे रहे और इससे प्रशासन के कामकाज पर प्रतिकूल असर पड़ा. नौकरशाही तभी सही तरीके से काम करती है, जब उसका शीर्ष नेतृत्व प्रभावशाली हो. इसे झारखंड की विडंबना ही कहेंगे कि अब तक वहां एक भी स्थिर सरकार का गठन नहीं हो पाया है. यह नेतृत्व की कमी का ही परिणाम है. मेरा मानना है कि आगामी चुनाव में वहां की जनता एक मजबूत और स्थिर सरकार का निर्माण करने की दिशा में कदम उठायेगी और झारखंड अपने संसाधनों की उपलब्धता और दूरदर्शी नेतृत्व की बदौलत सामाजिक और आर्थिक तौर पर सशक्त राज्य के तौर पर अपनी पहचान बनाने में सफल होगा.
(बातचीत पर आधारित)
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