सवालों की जगह खामोशी क्यों है!

Published at :08 Nov 2014 4:10 AM (IST)
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सवालों की जगह खामोशी क्यों है!

रंजन राजन प्रभात खबर, दिल्ली प्राथमिक कक्षाओं में एक कहानी पढ़ायी जाती है कछुआ और खरगोश की, जिसमें रेस के दौरान तेज दौड़नेवाला खरगोश रास्ते में थक कर सो गया था, जबकि धीरे-धीरे, किंतु लगातार चला कछुआ जीत गया था. इस कहानी के जरिये मास्टर जी सीख देते हैं कि बेटा लगातार लगे रहो, मंजिल […]

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रंजन राजन
प्रभात खबर, दिल्ली
प्राथमिक कक्षाओं में एक कहानी पढ़ायी जाती है कछुआ और खरगोश की, जिसमें रेस के दौरान तेज दौड़नेवाला खरगोश रास्ते में थक कर सो गया था, जबकि धीरे-धीरे, किंतु लगातार चला कछुआ जीत गया था. इस कहानी के जरिये मास्टर जी सीख देते हैं कि बेटा लगातार लगे रहो, मंजिल से पहले कभी हिम्मत न हारना. कुछ मास्टर जी साथ में यह भी जोड़ते हैं कि बहुत तेज दौड़नेवाला या तो मंजिल से पहले ही थक जाता है या फिर रास्ते में औंधे मुंह गिर जाता है.
यदि आप भारतीय राजनीति के पिछले तीन सालों के परिदृश्य पर गौर करें तो बहुत तेज दौड़ कर थक जाने या औंधे मुंह गिर जानेवालों के कई उदाहरण मिल जायेंगे. याद करें, दिल्ली में 5 अप्रैल, 2011 से हुए पहले अनशन के सुपरहिट होते ही अन्ना हजारे का जोश इतना बढ़ गया कि दनादन अनशन पार्ट टू, थ्री भी होने लगे. उनकी स्पीड इतनी तेज हो गयी कि मनमोहन सरकार की जमीन कांपने लगी. 70 पार के इस समाजसेवी में युवा जोश देख जनता भी आंदोलित हो गयी.
आखिर कांपती जमीन 2014 में फट गयी और मनमोहन सरकार उसमें समा गयी. लेकिन जाते-जाते उस सरकार ने लोकपाल कानून का झुनझुना जरूर थमा दिया. अब इस झुनझुने के साथ अन्ना थकान मिटा रहे हैं. अन्ना चुप तो जनता भी चुप! लोकपाल अब तक क्यों नहीं बना, यह कोई नहीं पूछ रहा है. पिछले माह समाचार एजेंसी पीटीआइ ने सूचना के अधिकार के तहत जानना चाहा कि लोकपाल के चेयरमैन और सदस्य बनने के लिए किन-किन लोगों ने आवेदन भेजे हैं, तो केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग से जवाब मिला कि लोकपाल संगठन को कार्यात्मक बनाने की प्रक्रिया अभी पूरी होनी बाकी है, इसलिए अभी इस स्तर पर जानकारी जुटायी नहीं गयी है.
अब अन्ना को कौन समझाये कि संसद का शीत सत्र शुरू होनेवाला है और अनशन रिटर्न्‍स के लिए गुलाबी ठंड का यह मौसम भी अच्छा है. फिर चुनाव सुधार वगैरह पर भी तो उन्हें आंदोलन शुरू करना था, उसका क्या! चुप तो बाबा रामदेव भी हैं, जिन्होंने काला धन के खिलाफ जून, 2011 के पहले हफ्ते में रामलीला मैदान से इतनी जोर से बिगुल फूंका कि केंद्र सरकार की नींद खराब हो गयी और आधी रात में पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि काले धन का उनका बहीखाता चुनावी जीत के जोरदार जश्न में कहीं गुम हो गया है, तो बाबा अपना वाला बहीखाता क्यों नहीं सौंप देते?
27 अगस्त, 2012 को लोकसभा में भाजपा के हंगामे के कारण बयान नहीं दे पाने के बाद संसद भवन के बाहर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संवाददाताओं से शायराना अंदाज में कहा था- ‘हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखे.’ क्या अब देश की जनता खामोशी साध कर मनमोहन की उस सीख को फॉलो कर रही है!
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