सफाई अभियान में दिखावा ज्यादा

Published at :06 Nov 2014 6:12 AM (IST)
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सफाई अभियान में दिखावा ज्यादा

वर्ष 2001 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 29 राज्यों में करीब दो करोड़ लोग मैला ढोने के कार्य में लगे हैं. तमिलनाडु से लेकर जम्मू-कश्मीर और गुजरात से लेकर मिजोरम तक के राज्य इसमें शामिल हैं यानी यह एक अखिल भारतीय कलंक है उन नेताओं, जो फोटो खिंचवाने के लिए झाड़ू के साथ खड़े हुए […]

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वर्ष 2001 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 29 राज्यों में करीब दो करोड़ लोग मैला ढोने के कार्य में लगे हैं. तमिलनाडु से लेकर जम्मू-कश्मीर और गुजरात से लेकर मिजोरम तक के राज्य इसमें शामिल हैं यानी यह एक अखिल भारतीय कलंक है

उन नेताओं, जो फोटो खिंचवाने के लिए झाड़ू के साथ खड़े हुए थे, के अभियान के बाद क्या कहीं सफाई हुई? उस कूड़े का क्या हुआ, जो उन्होंने झाड़ू से इकट्ठा किया था? वह कहां फेंका गया? ज्यादातर फोटो में तो कूड़ा दिख नहीं रहा था यानी सफाई भी साफ जगह चुन कर हो रही थी. कोई शौचालय साफ करते नहीं दिखा. यह अभियान महात्मा गांधी के जन्मदिन से शुरू हुआ और इसके प्रतीक चिह्न से स्पष्ट है कि इसके पीछे प्रेरणा गांधी की ही थी, पर गांधी तो साथ काम करने आये लोगों से पहले शौचालय साफ करवाते थे. जो लोग सड़कों पर झाड़ू लेकर उतरे, उनमें से कितनों ने वाकई में कोई कूड़ा या गंदगी साफ की? क्या यह एक बार होनेवाला कार्यक्रम था या नियमित होगा? इसमें शामिल लोग क्या अपने घरों में सफाई करते हैं? या फिर वे घर की महिलाओं, नौकरों या परंपरागत सफाई करनेवालों पर निर्भर रहते हैं?

नरेंद्र मोदी के सफाई अभियान में उन परंपरागत सफाईकर्मियों को तो कोई श्रेय दिया ही नहीं गया, जो रोज हमारे लिए सफाई करते हैं. हम उन्हें धन्यवाद देना ही भूल गये. सफाई का काम इतना निम्न श्रेणी का माना जाता है कि सिवाय उन जातियों के, जो परंपरागत रूप से ये काम करती हैं, अन्य कोई व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में इसे करना पसंद ही नहीं करता. यदि किसी अन्य जाति के व्यक्ति की सफाईकर्मी के रूप में नौकरी लग जाती है तो वह अपने वेतन का एक छोटा हिस्सा परंपरागत सफाईकर्मी को देकर उससे काम करवाता है. पूछा जाना चाहिए कि इस अभियान से परंपरागत सफाईकर्मियों की जिंदगी में कोई गुणात्मक परिवर्तन आया है? क्या हमने गटर में जिंदा इंसान के उतरने का कोई विकल्प ढूंढ़ा? गटर में उतरनेवाले सफाईकर्मी का जहरीली गैस की घुटन से मरना आम हो गया है. कौन सा सभ्य समाज अपने किसी नागरिक को गटर में उतरने जैसा अमानवीय काम करने देगा? किंतु हमारे समाज में बिना किसी ग्लानिबोध के यह काम होते हुए हम देखते हैं. आधुनिक प्रौद्योगिकी हमें अमानवीय श्रम से मुक्ति दिलाती है. किंतु गटर साफ करने के लिए मशीनों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता?

सफाईकर्मियों में सबसे घृणित काम मैला ढोनेवाली महिलाएं करती हैं. 1993 में मैला ढोनेवालों को काम पर रखना और शुष्क शौचालयों का निर्माण निषेध अधिनियम बना, जिसके तहत इस काम को गैर कानूनी बनाया गया. सरकार इस कानून के क्रियान्वयन को लेकर कितनी गंभीर है, अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो दशकों में एक भी व्यक्ति को इस कानून के उल्लंघन का दोषी नहीं पाया गया.

2013 में सरकार ने मैला ढोनेवालों को काम पर रखने को प्रतिबंधित करते हुए उनके पुनर्वास के लिए एक कानून बनाया, जिसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार भी मान रही है कि यह प्रथा अभी चल रही है. किसी जिले के जिलाधिकारी या राज्य के मुख्यमंत्री से इसके बारे में पूछा जाये, तो वे साफ कह देंगे कि उनके यहां यह प्रथा समाप्त हो चुकी है. लेकिन वास्तविकता इसके उलट है. 2001 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 29 राज्यों में करीब दो करोड़ लोग इस व्यवसाय में लगे हुए हैं. इनमें तमिलनाडु से लेकर जम्मू-कश्मीर और गुजरात से लेकर मिजोरम तक के राज्य शामिल हैं यानी यह एक अखिल भारतीय कलंक है.

सिर पर मैला ढोने की परंपरा तब समाप्त होगी, जब लोगों के पास बेहतर शौचालय होंगे. 2010 के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 34 प्रतिशत भारतीय आबादी को बेहतर शौचालय उपलब्ध है. पड़ोसियों से तुलना करें तो श्रीलंका, चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान और भूटान में क्रमश: 92, 64, 56, 48 और 44 फीसदी आबादी को शौचालय की सुविधा है. सिर्फ नेपाल में भारत से कम 31 प्रतिशत लोगों को शौचालय उपलब्ध है. सोचनेवाला विषय यह है कि दक्षिण एशिया में दो हिंदू बहुल आबादीवाले देशों में ही नागरिकों को सबसे कम शौचालय क्यों उपलब्ध हैं? कहीं इसका लेना-देना हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था से तो नहीं?

अंत में मुख्य सवाल यह है कि हम अपने कूड़े का निस्तारण कैसे कर रहे हैं? लखनऊ में कूड़ा गोमती नदी के किनारे जमा किया जा रहा है. वाराणसी में इसे वरुणा नदी के किनारे जमा किया जा रहा है, जो गंगा से जाकर मिलती है यानी हम मिट्टी के साथ पानी भी प्रदूषित कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी के मौजूदा सफाई अभियान से फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा. लोगों को लगेगा कि उन्होंने झाडू उठा कर अपनी जिम्मेवारी पूरी कर ली. सफाई के लिए कूड़े के निपटारे का सुरक्षित समाधान होना चाहिए. कूड़े में से जिन चीजों का पुन: इस्तेमाल हो सकता है, उन्हें छांट कर अलग करने और सभी के लिए बेहतर शौचालयों की व्यवस्था होनी चाहिए. फोटो खिंचवानेवाले सफाई अभियान से बात नहीं बनेगी, और गहराई में उतरना पड़ेगा. भला बिना गंदगी में उतरे कहीं सफाई हो सकती है? मोदी के सफाई अभियान में तो लोगों के कपड़े भी गंदे नहीं होते!

संदीप पांडेय

सामाजिक कार्यकर्ता

ashaashram@yahoo.com

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