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कॉरपोरेट और कॉन्ट्रैक्टर ने मिल कर बनाया लूटतंत्र

Updated at : 04 Nov 2014 4:39 AM (IST)
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कॉरपोरेट और कॉन्ट्रैक्टर ने मिल कर बनाया लूटतंत्र

राजेंद्र सिंह,सामाजिक कार्यकर्ता जब वर्ष 2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़ व उत्तराखंड राज्यों का जन्म हुआ, तो लोगों ने यह अपेक्षा की थी कि प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण इन तीनों राज्यों में बड़ी तेजी से विकास की बयार बहेगी. ये तीनों राज्य जल, जंगल और जमीन के साथ ही खनिज संसाधनों से परिपूर्ण राज्य के रूप […]

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राजेंद्र सिंह,सामाजिक कार्यकर्ता

जब वर्ष 2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़ व उत्तराखंड राज्यों का जन्म हुआ, तो लोगों ने यह अपेक्षा की थी कि प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण इन तीनों राज्यों में बड़ी तेजी से विकास की बयार बहेगी. ये तीनों राज्य जल, जंगल और जमीन के साथ ही खनिज संसाधनों से परिपूर्ण राज्य के रूप में पहचाने जाते थे, और इनकी इस पहचान के कारण यदि ये कुछ ही वर्षो में तीव्र विकास की बदौलत देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो जाते, तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं होता.

लेकिन ये तीनों राज्य अपनी इन्हीं कॉमन प्रोपर्टी के कारण कॉरपोरेट व कांट्रैक्टर के निशाने पर आ गये, और आज इस बात को लेकर कोई आश्चर्य नहीं रह गया है कि इन राज्यों में इनकी बदौलत संसाधनों की लूट मची हुई है. वर्ष 2014 में जब झारखंड एक बार फिर से विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, तो यह बहुत ही अनुकूल समय है कि हम थोड़ा ठहर कर यह विचार करें कि आखिर ऐसा क्यों हुआ.

जब नये राज्य का निर्माण हुआ, तो अपना निवेश बढ़ा कर फायदा कमाने के लिए इन्हीं कॉरपोरेट व कांट्रैक्टरों ने नवनिर्मित राज्य के नेताओं को लालच दिया कि वे आगे आयें और विकास में भागीदार बनें. नवगठित राज्य के राजनेताओं में न तो साङो संसाधनों को बचाने की चिंता थी, और न ही समझ. उसका परिणाम यह हुआ कि नये राज्य में मजबूत कानून कायदे के अभाव में इन तीनों ही राज्यों में कॉरपोरेट-कांट्रैक्टर के इस गंठजोड़ को प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने में आसानी हुई, और राजनेता इसी बात से खुश हो गये कि प्रदेश में माइनिंग इंडस्ट्री चले.

लेकिन यह माइनिंग इंडस्ट्री संसाधनों को किस तरह से बरबाद करेगी, इस बात पर किसी का ध्यान नहीं गया. जो पुराने उद्योगपति थे- जैसे जिंदल, अदानी, अंबानी आदि ने अपना फन पसारा और मौके का फायदा उठा कर संसाधनों पर कब्जा कर लिया. राजनीतिक अस्थिरता के अभाव में इन संसाधनों को बचा लेने के लिए न तो प्रदेश में पुख्ता राजनीतिक नेतृत्व था और न ही उस तरह के नेता ही मौजूद थे. क्योंकि नेतृत्व ही नारे गढ़ता है, और उसी से लोग जुड़ते हैं. लेकिन वहीं, विचार के अभाव में नारे भी गौण हो गये और प्रदेश की चिंता भी खत्म हो गयी.

इन राज्यों के निर्माण के पहले कई नारे दिये गये थे. उत्तराखंड निर्माण के समय यह नारा दिया गया था कि ‘अपनी जवानी, अपनी पानी, दोनों को सक्षम बनायेंगे. इन दोनों को शक्ति देंगे. लेकिन जैसे ही नये राज्य का गठन हुआ यह बहुप्रचलित नारा बदल गया. नया नारा गढ़ा गया कि उत्तराखंड को ऊर्जाखंड बनायेंगे, ऊर्जा बेचेंगे, और पैसा कमायेंगे. ऊर्जा खंड बनाने की आपाधापी में नदियों की हत्या होने लगी. इसी तरह अगर झारखंड को देखें तो यह पानी से समृद्ध राज्य था.

प्रदेश के गरीब आदिवासी जो झाड़ और जल का प्रबंधन करते थे, वे बड़ी कंपनियों के कारण जमीन से वंचित कर दिये गये और केवल वोट के निमित्त बन गये. सत्ता तंत्र में शामिल लोग दिन प्रतिदिन धनवान बनने के चक्कर में लग गये. ये सब इसलिए हुआ क्योंकि कॉरपोरेट और कांट्रैक्टर के इस गंठजोड़ ने इन्हें मछली से राजहंस बनाने का लालच दिया और ये उस लालच में फंस गये. मछली, बगुले और राजहंस अर्थात ‘मातस्य बाकुलीकरण’ के इस पूरे चक्र ने गांव के सुंदर तालाब और उसके किनारे के बरगद के पेड़ को तहस-नहस कर दिया.

नये राज्य बनने के बाद जब राजहंस शहर से सीधे वहां जाने लगा और जब उसने गांव के तालाब में देखा कि बगुले सभी मछलियों को खा रहे हैं, तो उसके मन में आया कि क्यों न बगुले को अपने अधीन कर लिया जाये. इसके बाद उसने उन्हें अपने जैसा बनाने का लालच दिया, और कहा कि जाकर तालाब से सारी मछलियों को लाओ तभी राजहंस बन पाओगे. इन बगुलों ने इन शहरी राजहंसों के उकसावे में जल्द-से-जल्द राजहंस बनने के लिए सारी मछलियों को बुला लिये.

इनको भी राजहंस बनने की बेचैनी थी, व्यवस्था बदलते ही राजहंस बनने के लिए सारी मछलियों को बुला लिये. जबकि राज्य को बचाने के लिए जरूरी था कि सारे बगुले मिल कर, सारी मछलियों को संगठित कर, संघर्ष वाहिनी बना कर राज्य को बचा सकते थे. लेकिन राजहंस बनने की आपाधापी में नया नेतृत्व नहीं उभर पाया. जरूरत इस बात की थी कि गांव, गांव कस्बे-कस्बे से राजहंस निकलता और राज्य को बचाने का प्रयास करता. लेकिन आज संगठित प्रयासों के अभाव में लूट मची हुई है. आज कोई ऐसा नेता भी नहीं दिखता, जो लोगों को संगठित कर राज्य को इस लूट तंत्र से बचा सके.

झारखंड एक बार फिर से चुनाव के मुहाने पर खड़ा है. राज्य के मतदाताओं को चाहिए कि वे अपने तालाब और उसकी मछलियों को अपने हाथ में रखें और संगठित होकर अच्छी मछलियां और अच्छे बगुले बनें तभी इनके बीच से सच्च राजहंस पैदा होगा और राज्य में राजनीतिक स्थिरता आयेगी. प्रदेश में होनेवाले पंचायत या विधानसभा में ऐसे लोगों को भेजें, जो राजहंस बनने की योग्यता रखते हों और जिनके नेतृत्व में संसाधनों का लोकतांत्रिकरण, सामुदायीकरण हो सके.

(आलेख बातचीत पर आधारित)

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