अब चुनाव में विनम्रता नहीं दिखती

Published at :03 Nov 2014 8:07 AM (IST)
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अब चुनाव में विनम्रता नहीं दिखती

राजनीति परिवारवाद का धंधा बन गयी है. अब विधायकों को खुद भी टिकट चाहिए, बेटों के लिए या पत्नी के लिए भी. दलीय प्रतिबद्धता खत्म हो गयी है. रात तक एक दल में, दूसरे दिन सवेरे किसी और दल में. मूल्यों की राजनीति खत्म हो गयी है. इसी वर्ष लोकसभा चुनाव हुए. फिर महाराष्ट्र और […]

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राजनीति परिवारवाद का धंधा बन गयी है. अब विधायकों को खुद भी टिकट चाहिए, बेटों के लिए या पत्नी के लिए भी. दलीय प्रतिबद्धता खत्म हो गयी है. रात तक एक दल में, दूसरे दिन सवेरे किसी और दल में. मूल्यों की राजनीति खत्म हो गयी है.

इसी वर्ष लोकसभा चुनाव हुए. फिर महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव हुए. अब झारखंड में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं. चुनावों में पानी की तरह पैसे बहाये जाते रहे हैं. जिस दिन झारखंड में चुनाव की घोषणा हुई थी, उसके एक दिन बाद एक चौक पर दो बुजुर्ग बात कर रहे थे कि अब तो सामान्य व्यक्ति चुनाव लड़ ही नहीं सकता. करोड़ रुपये हों, तभी हिम्मत करनी चाहिए. फिर करोड़ लायेंगे कहां से? दो नंबर के धंधे में ही यह संभव है. उनके बोलने का आशय साफ था कि इतना पैसा लाना हर किसी के वश में नहीं. उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा था. वे हालात को बता रहे थे. उन्होंने दुनिया देखी थी. पहले के चरित्रवान विधायकों को देखा था और अब के विधायकों के चरित्र को भी देख रहे हैं.

1952 में बिहार विधानसभा के लिए चुनाव हो रहे थे. दो ही दलों की चर्चा थी. एक कांग्रेस और दूसरा झारखंड पार्टी. कांग्रेस से चुनाव लड़नेवाले अधिकांश वे लोग थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी थी. दक्षिण बिहार में अलग झारखंड की लड़ाई चल रही थी. इसलिए झारखंड पार्टी के प्रत्याशी का चयन उसी आधार पर हुआ था. लेकिन दोनों दलों में ईमानदार, कर्मठ प्रत्याशी दिखते थे. चुनाव प्रचार के लिए राजा को छोड़ कर कोई हेलीकॉप्टर का उपयोग नहीं करता था. बैलगाड़ी से प्रचार होता था. संपन्न लोग जीप से प्रचार करते थे. चार-पांच सौ रुपये में चुनाव लड़ते थे. यही वजह थी कि अच्छे लोग चुन कर आये थे.

दक्षिण बिहार (अब का झारखंड) के कई पुराने विधायकों (खास कर 1952 का चुनाव लड़ चुके) से मुलाकात करने का अवसर मिला. इनमें सुखदेव माझी (चक्रधरपुर), कैलाश प्रसाद (पटमदा-जुगसलाई) जैसे विधायक थे. न किसी की पैरवी थी, न पैसा खर्च किया था. जयपाल सिंह मुंडा ने टिकट दिया और वे विधायक बन गये. टिकट भी पटना में बैठकर नहीं दिया. क्षेत्र में गये. सभी को बुलाया था और वहीं पर निर्णय लिया कि किसे टिकट देना है. किसी शिक्षक को टिकट दिया तो किसी खिलाड़ी को. आज के हालात में सुखदेव माझी, कैलाश प्रसाद जैसे लोगों को तो टिकट ही नहीं मिलता. राजनीति अब सेवा नहीं रह गयी है. कमाने का जरिया बन गयी है. उन दिनों लोग राजनीति में राज्य/देश के लिए कुछ करने के लिए आते थे.

उनमें जज्बा था, देशभक्ति थी. अब पैसा और ताकत के लिए आते हैं. कुछ दलों को छोड़ दें, तो एक-एक सीट के लिए करोड़ों रुपये की बोली लगती है. जाहिर है, करोड़ खर्च कर कोई विधायक बनेगा, तो सरकार का कई करोड़ का खजाना लूटेगा. लूटते भी हैं, फिर जेल भी जाते हैं. विधायक-मंत्री को जेल जाने में शर्म नहीं आती. वहां उन्हें तमाम सुविधाएं मिलती हैं. एहसास नहीं होता कि सर्किट हाउस में हैं या जेल में. झारखंड के ही इतिहास को देखिए. कई मंत्री-विधायक जेल गये. जनांदोलन या भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में नहीं, बल्कि संगीन अपराध कर जेल गये. ऐसे लोगों को किसने चुना? जनता ने ही. अब मतदाताओं की प्राथमिकता बदल गयी है.

याद करना होगा सनातन सरदार जैसे विधायक को. तीन बार विधायक, एक बार मंत्री रहे, लेकिन बेरोजगार बेटों के लिए कभी पैरवी नहीं की. जीवन के अंतिम क्षणों में भी खुद खेतों में काम करते रहे. महज 15 साल पहले तक सक्रिय (अब दिवंगत) घनश्याम महतो को कौन भूल सकता है. विधायक रहे, मंत्री रहे (बिहार के समय). दादू के नाम से विख्यात घनश्याम महतो हवाई चप्पल पहन कर बिहार विधानसभा में जाते थे. उनसे मिलने का कई बार मौका मिला. सादगी की प्रतिमूर्ति. जब विधायक थे, तब अपने क्षेत्र के मतदाताओं को पोस्टकार्ड भी भेजते थे. किसी मतदाता ने पत्र भेज दिया, तो तुरंत जवाब देते थे. अब घंटों विधायक आवास के बाहर खड़ा रहने के बावजूद महोदय का दर्शन दुर्लभ होता है. इतनी कड़ी सुरक्षा कि आम आदमी वहां जाने से भी डरे.

समय बदल गया है. इसलिए सीधे-साधे, ईमानदार या गरीब व्यक्ति को प्रत्याशी बनाने से पार्टी भी हिचकती है. हां, दो-चार ऐसे लोगों को सामने उदाहरण के लिए रखती जरूर है. राजनीति में स्वहित हावी हो गया है. राजनीति में पैसा है, ताकत है, इसलिए इसमें कमजोरों (चाहे पैरवी से, पैसे से) के लिए जगह नहीं है. राजनीति परिवारवाद का धंधा बन गयी है. अब विधायकों को खुद भी टिकट चाहिए, बेटों के लिए या पत्नी के लिए भी. दलीय प्रतिबद्धता खत्म हो गयी है. रात तक एक दल में, दूसरे दिन सवेरे किसी और दल में. मूल्यों की राजनीति खत्म हो गयी है. इन कमियों के बावजूद आशा की किरण नजर आती है. उच्च शिक्षा ग्रहण करने और बड़े पदों से इस्तीफा देकर भी कुछ लोग राजनीति में आ रहे हैं. अगर अच्छे युवा राजनीति में आयें और मूल्यों की, सेवा की भावना से राजनीति से जुड़ें, तो ये ही लोग बड़े बदलाव ला सकते हैं. ऐसी स्थिति में ही राजनीति की खोयी गरिमा लौट सकती है.

अनुज कुमार सिन्हा

वरिष्ठ संपादक

प्रभात खबर

anuj.sinha@prabhatkhabar.in
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