शॉल खरीदने के बहाने याद आयीं तल्ख यादें
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :01 Nov 2014 2:32 AM (IST)
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शिकोह अलबदर प्रभात खबर, रांची गुलाबी ठंड की शुरुआत होते ही पत्नी ने इच्छा जतायी कि क्यों न इस बार परिवार के सदस्यों के लिए शॉल खरीदी जाये. विचार अच्छा लगा. पर, सस्ती व अच्छी शॉल कहां मिलेंगी? पता किया तो बताया गया कि तिब्बती शरणार्थी हर साल गरम कपड़ों का बाजार शहर में लगाते […]
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शिकोह अलबदर
प्रभात खबर, रांची
गुलाबी ठंड की शुरुआत होते ही पत्नी ने इच्छा जतायी कि क्यों न इस बार परिवार के सदस्यों के लिए शॉल खरीदी जाये. विचार अच्छा लगा. पर, सस्ती व अच्छी शॉल कहां मिलेंगी? पता किया तो बताया गया कि तिब्बती शरणार्थी हर साल गरम कपड़ों का बाजार शहर में लगाते हैं. सो तय हुआ कि शॉल की खरीदारी उसी बाजार से होगी.
पत्नी संग बाजार पहुंचे. दूकानों पर महिलाएं ग्राहकों को गरम कपड़े दिखाने में व्यस्त थीं. नारी सशक्तीकरण का सुंदर नजारा हमें दिखा. श्रीमती जी को शॉल पसंद करने के लिए बोल मैं दुकानों का मुआयना करने लगा. इसी दरम्यान नजरें बांस के एक खंभे से लटकी तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा की फोटो पर टिक गयीं. दलाई लामा के होंठो पर मौजूद मुस्कान फोटो को जीवंत बना रही थी. एक बारगी जामिया मिलिया इसलामिया से जुड़ी याद तरोताजा हो गयी, जब अंसारी ऑडीटोरियम में दलाई लामा से रू-ब-रू होने का मौका मिला था.
सुरक्षा कवच के बीच से गुजर कर जिस तेजी से दलाई लामा से हाथ मिलाया था, वह दोस्तों के बीच चर्चा का विषय था. रोमांच इस बात का था कि एक बड़े व्यक्तित्व से मिलने का मौका मिला. कुछ दोस्तों ने इसकी तारीफ भी कि सो यह भी मन को खुश करने वाला था. खैर, स्टॉलों का मुआयना करते वापस पत्नी के पास पहुंचा तो देखा खरीदारी चल ही रही थी. उन्होंने शाल पसंद की और पैसे देने लगीं. तभी उन महिलाओं से मैंने पूछ ही लिया – क्या आप तिब्बत से हैं? नहीं, हम दाजिर्लिंग से आये हैं-जवाब मिला.
मालूम हुआ कि ये भारत में ही व्यापार कर जीवन बसर कर रहे हैं. भारत की विविधता ही यही है. सभी को समाहित कर लेने की. लेकिन उनका क्या, जो भारत के ही हैं? कश्मीर के लोग बंगाल जाकर बादाम और फलों का व्यापार करते हैं तो बंगाल के लोग दिल्ली जाकर खाने-पीने की वस्तुएं बेचते हैं. लेकिन कुछ वर्षो के दरम्यान जिस तरह से क्षेत्रीय भेदभाव व नस्लीय भेदभाव बढ़े हैं, वह डरा देने वाला है.
मुंबई और असम को ही ले लें. दिल्ली में तो आये दिन पूर्वोत्तर के छात्रों को नस्ली टिप्पणी का शिकार होना पड़ता है. बिहारी शब्द का इस्तेमाल गाली के समतुल्य ही होता है. ओये बिहारी है क्या?- जैसे वाक्य के साथ एक-दूसरे को दुतकारते युवा जरूर ही मिल जायेंगे. दिल्ली प्रवास के दौरान इस शब्द का अनुभव निजी तौर पर तो न था, लेकिन अन्य लोगों में इसकाइस्तेमाल एक चुभन जरूर देता था. कुछ देर के लिए ही सही, मन में तल्खियां लबरेज थीं.
इस बीच जब वापस स्टॉल पर पहुंचा तो पाया कि स्टॉल की महिलाएं जिस सुंदर अंदाज से पत्नी से बात कर रही थीं, उससे वो जरूर खुश दिख रहीं थीं और लगातार उन लोगों की तारीफ किये जा रही थीं. पत्नी के चेहरे पर झलकती खुशी देख तल्खियां कमजोर पड़ गयी थीं. खैर हमने कुछ अच्छी डिजाइन वाली शॉल खरीदी और घर लौट आये.
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