सीपीएम का पराभव और यह नयी बहस!

Published at :29 Oct 2014 12:34 AM (IST)
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सीपीएम का पराभव और यह नयी बहस!

असल में नीति गलत थी या उसका क्रियान्वयन! भारतीय राजनीति का यह एक असमाधेय सवाल है. किसी भी पार्टी या सरकार की नाकामी सामने आने पर कुछ लोग कहते हैं जब नीति ही ठीक नहीं, तो उनका क्रियान्वयन गलत होगा ही; जबकि दूसरे बताते हैं कि नीति ठीक है, क्रियान्वयन में गड़बड़ी रह गयी. यह […]

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असल में नीति गलत थी या उसका क्रियान्वयन! भारतीय राजनीति का यह एक असमाधेय सवाल है. किसी भी पार्टी या सरकार की नाकामी सामने आने पर कुछ लोग कहते हैं जब नीति ही ठीक नहीं, तो उनका क्रियान्वयन गलत होगा ही; जबकि दूसरे बताते हैं कि नीति ठीक है, क्रियान्वयन में गड़बड़ी रह गयी.

यह बहस बेनतीजा रहती है, इस बीच सरकार बदल जाती है या पार्टी हाशिये पर चली जाती है. पिछले दस सालों में संसद में सीटों की संख्या पांच गुना गंवानेवाली सीपीएम इन दिनों एक ऐसी ही बहस में उलझी है. बहस पार्टी महासचिव प्रकाश करात और पोलित ब्यूरो के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी के बीच है. करात कह रहे हैं कि पार्टी 1978 के जालंधर-प्रस्ताव के अनुरूप ही कांग्रेस के विरुद्ध गैर-कांग्रेसी पार्टियों का गंठजोड़ बनाने की राह पर चली. चूंकि ये पार्टियां मध्यवर्गीय व सामंती हितों को बढ़ावा देनेवाली थीं, इसलिए पराभव का मुंह देखना पड़ा है.

करात का समाधान है कि भविष्य में ऐसी पार्टियों के साथ गंठबंधन न बनाना पार्टी के हित में होगा. दूसरी ओर येचुरी का कहना है कि गैर-कांग्रेसी पार्टियों का गंठजोड़ बनाने की नीति सही थी, उस पर अमल ठीक से नहीं हुआ. महासचिव पद से अपनी विदाई की प्रतीक्षा करते करात हों या इस पद पर नजर टिकाये येचुरी, मार्क्‍स की शब्दावली में कहें तो दोनों के ऊपर अतीत-प्रेम का प्रेत मंडरा रहा है. उनके पास अपने वर्तमान को परिभाषित करने लायक भाषा नहीं है.

भारतीय राज्यसत्ता का महाआख्यान आज विकास के जुमले से तैयार हो रहा है. इस जुमले को सूचना, भागीदारी, पारदर्शिता और निगरानी जैसी शब्दावली के जरिये लोकतंत्र का जामा पहनाया जा रहा है. किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए अलग-अलग धाराओं का प्रतिनिधित्व करनेवाले दलों की संतुलित उपस्थिति जरूरी है, लेकिन साम्यवादी एवं प्रगतिशील धाराओं के प्रतिनिधित्व का दावा करनेवाले दल जब तक मौजूदा हकीकत की सटीक व्याख्या कर उसके अनुरूप रणनीति तैयार नहीं करेंगे, एक हारती हुई लड़ाई ही नये जोश से लड़ने के लिए अभिशप्त रहेंगे. देखना होगा कि सीपीएम अपनी नाकामियों की ईमानदार पड़ताल कर उसके अनुरूप नीतियों में जरूरी बदलाव लायेगी, या हाशिये की ओर अपने सफर को जारी रखेगी.

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