चुनावी नतीजों से निकलते संदेश

Published at :19 Oct 2014 11:50 PM (IST)
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चुनावी नतीजों से निकलते संदेश

शीर्ष नेतृत्व की मजबूती, जमीनी हकीकत के मुताबिक रणनीति तैयार करने का कौशल और जनता तक अपना संदेश प्रभावशाली तरीके से पहुंचाने की क्षमता के बूते राजनीतिक शून्य को भरा जा सकता है. हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने इस बात को फिर बखूबी साबित किया है. चालू राजनीतिक समझ के मुहावरे में देखें, […]

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शीर्ष नेतृत्व की मजबूती, जमीनी हकीकत के मुताबिक रणनीति तैयार करने का कौशल और जनता तक अपना संदेश प्रभावशाली तरीके से पहुंचाने की क्षमता के बूते राजनीतिक शून्य को भरा जा सकता है. हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने इस बात को फिर बखूबी साबित किया है.

चालू राजनीतिक समझ के मुहावरे में देखें, तो इन दोनों राज्यों में भाजपा के लिए जीत की राह आसान नहीं थी. इस चुनाव से पहले तक हरियाणा में भाजपा का राजनीतिक इतिहास चंद सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने भर का रहा था. वहां पार्टी के पास न तो सुचारु सांगठनिक ढांचा था, न ही कोई जाना-माना प्रदेश-स्तरीय चेहरा. महाराष्ट्र में भी स्थितियां बहुत अनुकूल नहीं थीं. गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद प्रदेश में पार्टी के पास कोई ऐसा कोई विश्वसनीय चेहरा नहीं रह गया था, जिसकी पूरे राज्य में अपील और पहचान हो. हरियाणा के विपरीत, महाराष्ट्र में पार्टी के पास सुगठित ढांचा तो था, पर सांगठनिक मौजूदगी के बावजूद वहां भाजपा का इतिहास शिवसेना के सहारे चलने का रहा है.

शिवसेना का सहारा भले 25 वर्षो से उसके साथ रहा था, पर सीटों के मामले में उसका कद हमेशा भाजपा से ऊंचा ही रहता आया था. लेकिन यह सहारा ऐन चुनाव के वक्त अलग हो गया था. स्पष्ट है कि हरियाणा और महाराष्ट्र का चुनावी संघर्ष भाजपा के लिए वैसा कतई नहीं था, जैसा बीते वर्षो में गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और एक हद तक राजस्थान में रहा है. हालांकि विपरीत परिस्थितियों में हरियाणा और महाराष्ट्र में हुई जीत में बड़ा योगदान इन दो राज्यों में मौजूद राजनीतिक शून्य का भी है. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के रूप में नरेंद्र मोदी ने इस शून्य के भीतर अपनी छवि को सबसे विश्वसनीय तरीके से पेश किया और चुनावी राजनीति के चाणक्य के रूप में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इसके लिए जमीन तैयार की. निश्चित रूप से यह भाजपा के लिए बड़ी जीत है, पर यह भी उल्लेखनीय है कि स्वयं भाजपा के भीतर यह मोदी और शाह की जोड़ी की भी जीत है.

इन नतीजों से यह संकेत भी निकलता है कि यदि केंद्रीय स्तर पर नेतृत्व मजबूत हो, तो विधानसभा चुनावों में प्रादेशिक नेतृत्व की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जाती. भाजपा की जीत का एक अर्थ यह भी है कि केंद्रीय नेतृत्व के पास विकास जैसा कोई आकर्षक संदेश हो, जिसमें देश के ज्यादातर लोगों की महत्वाकांक्षाओं को समेट लेने की ताकत हो, तो फिर ऐसे संदेश की काट तैयार कर पाना प्रांतीय स्तर की पार्टियों के लिए मुश्किल हो सकता है.

लोकसभा चुनावों की तरह दोनों राज्यों में भी भाजपा के पास चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी और संदेश के रूप में ‘विकास’ का ही नारा था. एक समानता यह भी रही कि महाराष्ट्र में कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन और हरियाणा में कांग्रेस सरकार का रवैया पुराने जनाधार की विरासत के सहारे वर्षो तक एक ही र्ढे पर शासन चलाने का रहा. विकास के जो काम उसकी सरकारों ने किये भी, उन्हें ठोस उपलब्धि के रूप में मतदाताओं के सामने विश्वसनीय तरीके से रख पाने में कांग्रेस पूरी तरह नाकाम रही. इस पराजय ने सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस नेताओं के पास मतदाताओं की महत्वाकांक्षाओं को समेटने और उकसाने वाली भाषा व तेवर नहीं हैं.

इस राजनीतिक शून्य के बीच भाजपा की लोकसभा की जीत की ऊर्जा ने एक उत्प्रेरक की तरह काम करते हुए बाजी उसके पक्ष में पलट दी. कांग्रेस को एक राजनीतिक दल के रूप में, इन नतीजों के आंतरिक और बाहरी कारणों पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए. सोनिया गांधी समेत पार्टी के तमाम बड़े नेताओं को हार की जिम्मेवारी लेते हुए, दूरगामी सोच के साथ नयी रणनीति तैयार करनी होगी. नेतृत्व के दूरदर्शितापूर्ण रवैये के बिना कांग्रेस के लिए मोदी और भाजपा के इस उभार को रोक पाना असंभव होगा.

बड़े नेता यदि आलाकमान के प्रति अंधभक्ति और ‘प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ’ जैसे नारों के जरिये चापलूसी की प्रवृत्ति से उबरने की कोशिश नहीं करेंगे, तो कांग्रेस का भविष्य और अधिक अंधकारपूर्ण होना तय है. इन नतीजों पर विचार मंथन क्षेत्रीय दलों को भी करना होगा. अगर मोदी का विजय रथ यूं ही निर्बाध चलता रहता है, तो कांग्रेस के बाद बरबाद होने की बारी उनकी ही होगी. कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों को सोचना होगा कि भाजपा की चुनौती का समुचित ढंग से सामना करना न सिर्फ उनके अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है, बल्कि विपक्ष के रूप में उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेवारी भी है. उनकी सकारात्मक राजनीतिक सक्रियता से ही भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा.

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