मीडिया से मोदी के परहेज का मतलब

Published at :30 Sep 2014 5:05 AM (IST)
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मीडिया से मोदी के परहेज का मतलब

आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र मोदी एक स्वाभाविक वक्ता हैं और मीडिया से परे रह कर भी अपने श्रोताओं तक वे सीधे पहुंच सकते हैं. ऐसा उन नेताओं के साथ नहीं है, जिन्हें पूरा कवरेज नहीं मिलता है. ऐसे नेताओं को मीडिया की बिल्कुल जरूरत है. भारतीय मीडिया के सामने एक समस्या है. प्रधानमंत्री नरेंद्र […]

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आकार पटेल
वरिष्ठ पत्रकार
नरेंद्र मोदी एक स्वाभाविक वक्ता हैं और मीडिया से परे रह कर भी अपने श्रोताओं तक वे सीधे पहुंच सकते हैं. ऐसा उन नेताओं के साथ नहीं है, जिन्हें पूरा कवरेज नहीं मिलता है. ऐसे नेताओं को मीडिया की बिल्कुल जरूरत है.
भारतीय मीडिया के सामने एक समस्या है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खूब बोलते हैं और अच्छा भी बोलते हैं, लेकिन वे मीडिया से नहीं बोलते हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी संवाददाताओं, खासकर टेलीविजन वालों, से मिलते थे. लेकिन, अब वे अपने असली अंदाज में लौट गये हैं, जो सोशल मीडिया और भाषणों के माध्यम से संवाद करने का रहा है, न कि साक्षात्कारों और संवाददाता सम्मेलनों के जरिये.
प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने एकमात्र पत्रकार सीएनएन के फरीद जकारिया को एक साधारण साक्षात्कार के लिए समय दिया, जिसका उद्देश्य भारतीय नेता से दुनिया को परिचय कराना था. अब एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, जो पेशेवर संपादकों के बजाय मालिकानों द्वारा नियंत्रित एक सुस्त संस्था है, ने परेशान होकर मोदी की संकीर्णता की शिकायत की है. पिछले दिनों एक बयान में इस संस्था ने कहा कि ‘सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का निश्चित अभाव है.’ गिल्ड ने कहा है कि ‘प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया प्रभारी बनाने में देरी, मंत्रियों और नौकरशाहों के कार्यालयों में मीडिया की पहुंच को सीमित कर और देश में तथा देश से बाहर सूचनाओं के प्रसार को कम कर मोदी सरकार अपने कार्यकाल के शुरुआती दिनों में ही उस राह पर चल रही है, जो लोकतांत्रिक विमर्श और जवाबदेही के मानदंडों के विपरीत है.’
मोदी सरकार का यह रवैया शुरुआती दिनों में ही दिखना शुरू हो गया था. स्क्रॉलडॉटइन वेबसाइट ने जून में ही खबर दी थी कि ‘वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ मोदी की बैठक के बारे में एक तथ्य पर चर्चा नहीं हुई कि उन्होंने अधिकारियों को मीडिया से दूर रहने का निर्देश दे दिया था.’ प्रधानमंत्री ने ‘मंत्रिमंडल के अपने सहयोगियों को पत्रकारों से बात नहीं करने को कहा और सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता को ही उनकी तरफ से बोलने की अनुमति दी.’ यह ‘नयी दिल्ली को गांधीनगर बनाने की दिशा में पहला गंभीर कदम था. वहां नरेंद्र मोदी के बतौर मुख्यमंत्री तीन कार्यकालों में उनके मंत्री बिना उनसे अनुमति लिये प्रेस से बात नहीं करते थे. यहां तक कि राज्य मंत्रिमंडल की बैठकों के बाद होनेवाले औपचारिक संवाददाता सम्मेलन भी या तो नहीं होते थे, या राज्य सरकार के प्रवक्ताओं द्वारा संबोधित किये जाते थे, जबकि अन्य राज्यों में मंत्री ही मीडिया से बात करते हैं.’
जब नरेंद्र मोदी को कुछ कहना होता है तो वे ट्वीट करते हैं, ब्लॉग लिखते हैं या भाषण देते हैं. एडिटर्स गिल्ड का कहना है कि यह कतई संतोषजनक नहीं है- ‘शीर्ष से नीचे की ओर एकतरफा संवाद पाठकों, दर्शकों, इंटरनेट उपभोक्ताओं और श्रोताओं की बहुत बड़ी संख्या के लिए उस देश में अपर्याप्त है, जहां इंटरनेट की सुविधा और तकनीकी जागरूकता सीमित है. वाद-विवाद, संवाद और बहस-मुबाहिसे लोकतांत्रिक-विमर्श के लिए जरूरी तत्व होते हैं.
यह बात बिल्कुल ठीक है, लेकिन इतिहास यही है कि नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री रहते औपचारिक बातचीत के लिए गुजराती मीडिया को भी शायद ही कभी-कभार अवसर दिया हो. हालांकि, 2002 के दंगों से पहले ऐसा नहीं था. उन्होंने बाद में यह अकेलापन ओढ़ लिया और करन थापर के एक कार्यक्रम में सवाल पूछने के तरीके से चिढ़ कर बीच में ही उठ जाने के बाद राष्ट्रीय मीडिया से खुद को बिल्कुल दूर कर लिया.
मैं काफी साल पहले एडिटर्स गिल्ड की एक्जिक्यूटिव कमिटी का सदस्य था. 2002 में हम तीन लोग, जिनमें टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक दिलीप पडगांवकर और हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक बीजी वर्गीस भी थे, गुजरात दंगों में मीडिया की भूमिका की जांच करनेवाले दल में शामिल हुए. नरेंद्र मोदी ने तब हमलोगों से मुलाकात की और बातचीत में उनका रवैया बहुत खुला था. हालांकि हम यह महसूस कर सकते थे कि वे रक्षात्मक थे और उनमें पीड़ित होने का भाव था.
दंगों के बाद के महीनों में मीडिया से मोदी के संबंध खराब होते गये. राज्य में सबसे अधिक प्रसार वाले दैनिक अखबार ‘गुजरात समाचार’ को वे पहले से ही नापसंद करते थे. राज्य सरकार ने इस स्थिति की प्रतिक्रिया अजीब ढंग से देते हुए एक समय अपना ही अखबार निकाल दिया, जिसका नाम ‘गुजरात सत्य समाचार’ था, जिसे हर घर में मुफ्त बांटा जाता था. यह एक परचा था, जो मोदी की उपलब्धियों को प्रचारित करता था, जिन पर उनकी नजर में अखबार ध्यान नहीं दे रहे थे.
मीडिया से स्वयं दूरी बनाने के साथ मोदी ने अपने मंत्रियों को भी प्रेस से दूर रहने का निर्देश दिया था. दिल्ली में भी ऐसा ही होने की आशंका से गिल्ड उचित ही परेशान है. उसके अनुसार, ‘हालांकि सूचनाएं विभिन्न तरीकों से बाहर आ जाती हैं, लेकिन स्नेत के उल्लेख के साथ स्पष्टीकरण देने और कार्यालय में या बाहर कार्यरत लोगों से प्रतिक्रिया लेने जैसे पत्रकारिता के स्थापित पेशेवराना तरीकों से खबरें देने से जनता को सही सेवा दी जा सकती है. गिल्ड सरकार से पेशेवर पत्रकारों और समाचार माध्यमों से अधिक सक्रियता से संपर्क रखने और उनकी पहुंच को बढ़ाने का अनुरोध करता है.’ हालांकि ऐसे निवेदनों से नरेंद्र मोदी के प्रभावित होने की संभावना नहीं है.
मुख्यधारा की मीडिया को किनारे करने का उनका एक तरीका उनकी जोरदार इंटरनेट उपस्थिति है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया के प्रबंधन के लिए दो हजार लोगों की एक टीम तैयार की है, जिसका नेतृत्व हीरेन जोशी नामक व्यक्ति के हाथ में है. चीन सरकार के बाद संभवत: मोदी सरकार का सोशल मीडिया प्रचार तंत्र ही सबसे प्रभावकारी है. हालांकि यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि यह सिर्फ अनिच्छुक लोगों तक बलात सूचना पहुंचाने का प्रयास नहीं है. उनके संदेश युवाओं को, खासकर जो मध्यवर्ग से आते हैं, आकर्षित करते हैं और उनके साथ बहुत अच्छी तरह से जुड़ पाते हैं. यही जुड़ाव उन्हें अखबारों और टीवी चैनलों से संबंध-विच्छेद का आत्मविश्वास देता है.
नरेंद्र मोदी ने चुनाव अभियान में वरिष्ठ एंकरों को समय दिया था, क्योंकि उन्हें उनकी जरूरत थी, लेकिन अब उन्हें ऐसा नहीं लगता और यह बिल्कुल ठीक है. वे एक स्वाभाविक वक्ता हैं और मीडिया से परे अपने श्रोताओं तक वे सीधे पहुंच सकते हैं. ऐसा उन नेताओं के साथ नहीं है, जिन्हें पूरा कवरेज नहीं मिलता है. ऐसे नेताओं को मीडिया की बिल्कुल जरूरत है. गतिविधियों की जानकारी के लिए मीडिया को मोदी के इर्द-गिर्द मौजूद लोगों से बात करनी होगी, लेकिन यह आसान नहीं होगा, और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया को इसका एहसास है.
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