अंतरिक्ष में गरबा करने से पहले

Published at :29 Sep 2014 4:13 AM (IST)
विज्ञापन
अंतरिक्ष में गरबा करने से पहले

गुजरात में गरबा अब नवरात्रि के पूजा-भाव का हिस्सा कम, देर रात चलनेवाली उत्सवी ‘पार्टी-भाव‘ का हिस्सा ज्यादा है.. गुजरात में जो हुआ है, क्या गुजरात के आर्थिक म़ॉडल पर चलनेवाले हिंदुस्तान में भी होगा, धन बढ़ेगा और दिल सिकुड़ेगा? जैसे ‘भांगड़ा’ को पंजाबियत के एक प्रतीक के तौर पर देखा जाने लगा है, गुजरात […]

विज्ञापन

गुजरात में गरबा अब नवरात्रि के पूजा-भाव का हिस्सा कम, देर रात चलनेवाली उत्सवी ‘पार्टी-भाव‘ का हिस्सा ज्यादा है.. गुजरात में जो हुआ है, क्या गुजरात के आर्थिक म़ॉडल पर चलनेवाले हिंदुस्तान में भी होगा, धन बढ़ेगा और दिल सिकुड़ेगा?

जैसे ‘भांगड़ा’ को पंजाबियत के एक प्रतीक के तौर पर देखा जाने लगा है, गुजरात की पहचान के साथ ‘गरबा’ भी कुछ वैसे ही नत्थी हो चला है. संभव है, ऐसा हिंदी फिल्मों की मेहरबानी से हुआ हो. ‘भांगड़ा’ के बारे में तो ऐसा कह ही सकते हैं. ‘गरबा’ को फिल्मों में जगह मिली है, लेकिन ‘भांगड़ा’ से कम. गरबा को गुजरात की पहचान के एक सशक्त प्रतीक के रूप में दर्ज करने का काम ‘नवरात्रि’ ने किया है. गुजरात सरकार ने अपनी वेबसाइट पर इसे माना है. वह गरबा को प्रदेश की पहचान बताने का मौका नहीं चूकती. हाल में, भारत का मंगल मिशन सफल रहा तो इसमें गुजराती वैज्ञानिकों के योगदान की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने कहा कि एक दिन ऐसा भी आयेगा ‘जब गुजराती लोग अंतरिक्ष में गरबा करेंगे.’

कहते हैं, ‘गरबा’ तत्सम ‘गर्भद्वीप’ का तद्भव है. मिट्टी के कुंभ में ढेर सारे छेद बना कर भीतर दीप प्रज्‍जवलित किया जाता है. इस कुंभ को केंद्र में रख कर ही उसके इर्द-गिर्द स्त्रियां गोलाकार ‘गरबा’ करती हैं. इसे देवी की आरती से पहले करने की प्रथा है, डांडिया आरती के बाद होता है और उसमें पुरुष भी भाग लेते हैं. नवरात्रि के वक्त घड़े में दीप प्रज्‍जवलित करके नृत्य करने के पीछे कुछ तो अर्थ होगा! कुंभ हिंदू के सांस्कृतिक मानस में स्थूल देह का प्रतीक है. पुरानी कविता में बड़े प्रयोग मिलते हैं इसके. जीवन-मरण के चक्र के भीतर अस्तित्व की अनश्वरता को लक्ष्य करके कबीर ने कहा था- ‘फूटा कुंभ जल जलहि समाना.’ गुरु और शिष्य के संबंध की बात आयी तो कबीर ने शिष्य को कुंभ बताते हुए गुरु को ऐसा कुम्हार कहा ‘जो गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट’. अपने भीतर के खोट काढ़ने-निकालने की ही कोई बात होगी, जो नवरात्रि के समय कुंभ के भीतर दीप रखकर उसके गिर्द ‘गरबा’ होता है. दीपशिखा हमेशा ऊपर उठती है, कहते हैं चेतना का भी यही गुण है. नवरात्रि से जुड़े तप और संयम का एक अर्थ यह भी तो है कि देह के भीतर चेतना उघ्र्वगामी हो, वह मूलाधार में ही न रहे, सहस्नर तक पहुंचे, सारी सृष्टि को आत्मवत् पहचाने! सर्वभुतेषु नानारूपों में विद्यमान देवी को नमस्कार करते देवों की स्तुति अपनी तरफ से यह तो कहती ही है.

गुजरात सरकार की वेबसाइट कहती है गरबा में ‘हर समुदाय, वर्ग और उम्र के लोग भाग लेते हैं’, लेकिन सब लोगों को आत्मवत् देखने का यही घोष गुजरात के गरबा से गायब हो रहा है. सांस्कृतिक पहचान में संपूर्ण समुदाय की भागीदारी हो- यह अर्थ ‘लव जेहाद’ के हौव्वे के बीच उलट गया है. इंडियन एक्सप्रेस ने छापा है कि वडोदरा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र) में होनेवाले गरबा महोत्सव के आयोजक अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं से निपटने के लिए पुलिस की सहायता ले रहे हैं. महोत्सव के आयोजकों को संतोष है कि उन्होंने इस दफे ‘एक भी मुसलिम प्रतिभागी को भागीदारी के लिए भरा जानेवाला आवेदन फॉर्म नहीं दिया है.’ तो क्या आर्थिक धरातल पर शेष भारत की तुलना में समृद्ध होते गुजरात का हृदय सामाजिक धरातल पर सिकुड़ रहा है?

बहुतायत को कंगाल रख थोड़े से लोगों तक सीमित रहनेवाली समृद्धि जब अपनी पहचान गढ़ती है तो अनिवार्यतया संस्कृति के तत्वों के अर्थ भी सिकोड़ देती है. गुजरात में यही हो रहा है. ऐसा हो ही नहीं सकता कि संस्कृति समावेशी हो, सबको समेट कर चले और आर्थिकी अपवर्जी हो; कुछ को चुने, शेष को छांट दे. गुजरात के सांस्कृतिक प्रतीक बनते ‘गरबा’ के अर्थ में हाल के दिनों में आये परिवर्तन को लक्ष्य करके इसे समझा जा सकता है. गुजरात में गरबा अब नवरात्रि के पूजा-भाव का हिस्सा कम, देर रात चलनेवाली उत्सवी ‘पार्टी-भाव‘ का हिस्सा ज्यादा है. इस पार्टी में शामिल होने के लिए मोटी फीस वसूली जाती है. फीस की मोटाई के हिसाब से आपको गरबा के रंगस्थल का रूपहला परिवेश हासिल होता है. इस रूपहले परिवेश में मौज-मजे के वे तत्व घुस आये हैं, जिनका रिश्ता पूजा-भाव से जुड़े संयम से कम, इंद्रियों के उत्सव से ज्यादा है. गरबा इंद्रियों के उत्सव की प्रतियोगिता में तब्दील हो गया है, जो सामाजिक डार्विनवाद की टेक पर कहता है कि भारी जेब वाला ही इस रंगस्थली का सिकंदर है.

सन् 2000 के आसपास से इस आशय के समाचार छपने लगे थे कि नवरात्रि के वक्त गुजरात के शहरों में गर्भ-निरोधकों की बिक्री बढ़ जाती है. 14 साल पहले जब आनंदीबेन गुजरात में शिक्षा मंत्री थीं, तो नवरात्रि के बाद के महीनों में गर्भपात की बढ़ती संख्या पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि अभिभावक अपने बच्चों के व्यवहारों को लेकर सतर्कता बरतें. 14 सालों में गुजराती समाज ने सतर्कता तो बरती है, लेकिन कुछ इस तरह कि दोषी हमेशा के लिए कोई दूसरा (अल्पसंख्यक) दिखायी दे. गुजरात में जो हुआ है, क्या गुजरात के आर्थिक म़ॉडल पर चलनेवाले हिंदुस्तान में भी होगा, धन बढ़ेगा और दिल सिकुड़ेगा?

चंदन श्रीवास्तव

एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस

chandanjnu1@gmail.com

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola