न थी उम्मीद जिसकी वह मिलने की खुशी

Published at :26 Sep 2014 2:08 AM (IST)
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न थी उम्मीद जिसकी वह मिलने की खुशी

ब्रह्नांड में सबसे बुद्धिमान प्राणी कौन है? इसका जवाब कोई भी दे सकता है. आप भी. हम भी. लेकिन जवाब सदैव पक्षपातपूर्ण ही माना जायेगा. अपने मुंह मियां मिट्ठ बनने वाले प्राणियों में शिरोमणि माने जानेवाले मनुष्य को इसका जवाब देने में जरा भी संकोच नहीं होता. क्या हमने अन्य प्राणियों की राय ली? उनका […]

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ब्रह्नांड में सबसे बुद्धिमान प्राणी कौन है? इसका जवाब कोई भी दे सकता है. आप भी. हम भी. लेकिन जवाब सदैव पक्षपातपूर्ण ही माना जायेगा. अपने मुंह मियां मिट्ठ बनने वाले प्राणियों में शिरोमणि माने जानेवाले मनुष्य को इसका जवाब देने में जरा भी संकोच नहीं होता. क्या हमने अन्य प्राणियों की राय ली? उनका जवाब सुन-समझ लेते तो शायद मानव जाति की खुशफहमी ही दूर हो जाती. अप सोच रहे होंगे कि अनायास ही इस तरह के दार्शनिक विचार हमारी खोपड़ी में तो आ नहीं सकते. आप सही हैं. जबसे हमारे प्रधानमंत्री ने मुसलमानों को देशभक्ति का सर्टिफिकेट दिया है, तब से हमारे फुरकान भाई फूले नहीं समा रहे. उनकी छाती पता नहीं कितने गज की हो गयी है.

समाज सेवा के लिए गांव-समाज से लेकर जिला स्तरीय मंच तक पर सम्मानित हो चुके हैं. लेकिन जब से प्रधानमंत्री ने मुसलमानों को सर्टिफिकेट दिया है, तब से वह खुद को ज्यादा सम्मानित महसूस करने लगे हैं. पक्ष- विपक्ष सभी प्रधानमंत्री के बयान की सराहना कर रहे हैं.

लेकिन आखिर इसकी नौबत क्यों आयी? कोई इसे वोट बैंक से जोड़ रहा है, तो कोई इसे राजनीति व कूटनीति से. फुरकान भाई जैसे लोगों का मानना है कि मुसलमानों को देशभक्ति का सर्टिफिकेट लेने के लिए किसी नेता के बयान का आसरा नहीं लेना पड़ेगा. हिंदुस्तानी मुसलमान दुनिया की पहली वह कौम है, जिसने अपनी मरजी से अपना वतन चुना. बंटवारे के समय भारत में अपनी मरजी और खुशी से रुका. भारत, इस मुल्क के मुसलमानों का अपना मुल्क है. इस मुल्क की आजादी की तारीख मुसलमानों की बेहिसाब कुरबानियों को भुला कर नहीं लिखी जा सकती. इस मुल्क की आजादी और तरक्की की हर ईंट में मुसलमानों का खून शामिल है.

यह एक ऐसी हकीकत है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. आखिर भारत का मुसलमान देश पर नहीं मर मिटेगा, तो क्या दाऊद और ओवैसी जैसों पर अपने को कुर्बान करेगा? हालांकि प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद सेक्युलर पार्टियों की रातों की नींद जरूर उड़ गई है. उनकी खामोशी बता रही है की इस प्रकार के बयान के बाद उनका वोट बैंक खिसक गया है. तथाकथित सेक्युलर पार्टियां शायद ही चुप बैठें. इस बयान को भी राजनीतिक रंग दिया जा सकता है. इस पर भी हाय-तौबा मच सकती है. इसे मुसलमान व हिंदू के नजरिये से देखा जा सकता है. इस बात पर कई जानकार सवाल भी खड़े कर रहे हैं. हर साक्षात्कार से पहले पत्रकार से सवाल की मांग करनेवाले और पत्रकार कौन सा सवाल पूछेगा, इसकी सूची मांगनेवाले के इस बयान पर सवाल उठना भी लाजिमी है. एक पत्रकार के तीखे सवाल पर तो उन्होंने बीच रास्ते में हेलीकॉप्टर से उतार दिया था. सवाल या जवाब कुछ भी हो, फुरकान भाई जैसे लोगों को तो उसी की प्रशंसा भाती है, जिससे प्रशंसा हासिल करने की उम्मीद सिफर हो.

लोकनाथ तिवारी

प्रभात खबर, रांची

lokenathtiwary@gmail.com

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